डोकलाम विवाद के कारण मुसीबत में चीनी राष्ट्रपति चिनफिंग, उठ रहे सवाल !
इसमें कोई शक नहीं कि चीन एक महाशक्ति है, लेकिन उनकी हरकतें गली के किसी गुंडे जैसी हैं। लेकिन डोकलाम विवाद राष्ट्रपति चिनफिंग के लिए गले की हड्डी जैसा बन गया है।
कलाम विवाद को करीब तीन महीने होने जा रहे हैं। इतने समय से दोनों देशों की सेनाएं यहां आमने-सामने खड़ी हैं। भारत जहां एक ओर इस विवाद का कूटनीतिक हल निकालने की कोशिशों में जुटा है, वहीं चीन की नापाक हरकतों को देखते हुए सीमा पर भी चौकसी बरते हुए है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह को इस विवाद के जल्द सुलझने की उम्मीद है। भारत ने इस विवाद को सुलझाने का जो रास्ता सुझाया था, चीन उसे मानने को तैयार नहीं है। चीन की तरफ से रोज नई-नई तरह की धमकियां दी जा रही हैं। इन धमकियों के पीछे उसकी बौखलाहट साफ झलकती है।
चिनफिंग के लिए मुसीबत बना डोकलाम
डोकलाम विवाद चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग के लिए एक तरह से गले की हड्डी बन चुका है। अपनी अकड़ के चलते चीन यहां से पीछे हटने को तैयार है और ऐसा प्रतीत होता है कि वह युद्ध में भी नहीं जाता चाहता। क्योंकि युद्ध हुआ तो इसका नुकसान चीन को भी उठाना पड़ेगा। इस मामले पर राष्ट्रपति चिनफिंग कई तरफ से घिर चुके हैं। इसे सुलझाने में नाकामी उनकी घरेलू और अंतरराष्ट्रीय साख के लिए खातक साबित हो रही है। अपनी ही पार्टी में उन पर लोगों का भरोसा कम होता दिख रहा है। इसी साल चीन में कई अहम बैठकें होने जा रही हैं। ऐसे में चिनफिंग पर दबाव होगा कि वह समय रहते डोकलाम विवाद का स्थायी हल खोज निकालें, जिससे पार्टी में उनका कद बना रहे।
पार्टी में गिर रहा चिनफिंग का कद
इस साल के अंत तक चीन की कम्युनिस्ट पार्टी अपनी 19वीं कांग्रेस का आयोजन करने जा रही है। राष्ट्रपति शी चिनफिंग की कोशिश होगी कि वे इसमें अपनी जगह पक्की करें। हालांकि उम्र के आधार पर चिनफिंग और चीनी प्रधानमंत्री ली केकियांग को ही पोलित ब्यूरो में जगह मिलेगी। आशंकाएं हैं कि चिनफिंग पोलित ब्यूरो की स्टैंडिंग कमेटी में अपने खास लोगों को जगह दिलाने की योजना बना रहे हैं। लेकिन, डोकलाम मुद्दे के चलते उन्हें इस बैठक में विरोध का सामना भी करना पड़ सकता है।
इसमें कोई शक नहीं कि चीन एक महाशक्ति है, लेकिन उनकी हरकतें गली के किसी गुंडे जैसी हैं। लेकिन डोकलाम विवाद राष्ट्रपति चिनफिंग के लिए गले की हड्डी जैसा बन गया है।
कलाम विवाद को करीब तीन महीने होने जा रहे हैं। इतने समय से दोनों देशों की सेनाएं यहां आमने-सामने खड़ी हैं। भारत जहां एक ओर इस विवाद का कूटनीतिक हल निकालने की कोशिशों में जुटा है, वहीं चीन की नापाक हरकतों को देखते हुए सीमा पर भी चौकसी बरते हुए है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह को इस विवाद के जल्द सुलझने की उम्मीद है। भारत ने इस विवाद को सुलझाने का जो रास्ता सुझाया था, चीन उसे मानने को तैयार नहीं है। चीन की तरफ से रोज नई-नई तरह की धमकियां दी जा रही हैं। इन धमकियों के पीछे उसकी बौखलाहट साफ झलकती है।
चिनफिंग के लिए मुसीबत बना डोकलाम
डोकलाम विवाद चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग के लिए एक तरह से गले की हड्डी बन चुका है। अपनी अकड़ के चलते चीन यहां से पीछे हटने को तैयार है और ऐसा प्रतीत होता है कि वह युद्ध में भी नहीं जाता चाहता। क्योंकि युद्ध हुआ तो इसका नुकसान चीन को भी उठाना पड़ेगा। इस मामले पर राष्ट्रपति चिनफिंग कई तरफ से घिर चुके हैं। इसे सुलझाने में नाकामी उनकी घरेलू और अंतरराष्ट्रीय साख के लिए खातक साबित हो रही है। अपनी ही पार्टी में उन पर लोगों का भरोसा कम होता दिख रहा है। इसी साल चीन में कई अहम बैठकें होने जा रही हैं। ऐसे में चिनफिंग पर दबाव होगा कि वह समय रहते डोकलाम विवाद का स्थायी हल खोज निकालें, जिससे पार्टी में उनका कद बना रहे।
पार्टी में गिर रहा चिनफिंग का कद
इस साल के अंत तक चीन की कम्युनिस्ट पार्टी अपनी 19वीं कांग्रेस का आयोजन करने जा रही है। राष्ट्रपति शी चिनफिंग की कोशिश होगी कि वे इसमें अपनी जगह पक्की करें। हालांकि उम्र के आधार पर चिनफिंग और चीनी प्रधानमंत्री ली केकियांग को ही पोलित ब्यूरो में जगह मिलेगी। आशंकाएं हैं कि चिनफिंग पोलित ब्यूरो की स्टैंडिंग कमेटी में अपने खास लोगों को जगह दिलाने की योजना बना रहे हैं। लेकिन, डोकलाम मुद्दे के चलते उन्हें इस बैठक में विरोध का सामना भी करना पड़ सकता है।
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