भारत माता की जय !
🙏🏻🇮🇳🚩
#बात_में_दम_है
यह सारी दुनिया को पता है कि भारत के "माननीय न्यायालय" स्टे-ऑर्डर देने में तथा फैसले सुरक्षित रखने में "माहिर" होते हैं. बाबा रामरहीम के इस मामले में भी "माननीय" चाहते तो बड़े आराम से फैसला एक माह या पन्द्रह दिन सुरक्षित रख लेते... मुझे तो नहीं लगता कि भीड़ बार-बार एकत्रित हो सकती है... भीड़ को कभी न कभी तो थकना ही है.... "माननीय" कोई भी कानूनी तकनीकी पेंच फँसाकर मामले को तब तक टालते जाते, जब तक की बाबे के भक्तों की भीड़ बोर होकर कम होने लगती, या हरियाणा सरकार कोई पुख्ता व्यवस्था कर लेती...
माना कि खट्टर और कैप्टन सरकार भीड़ को एकत्रित होने से रोकने में नाकाम रही, इनका इंटेलीजेंस भी फेल रहा... लेकिन कोर्ट के "माननीय" किसी दूसरी दुनिया में तो नहीं रहते हैं, उन्हें भी आम लोगों की तरह, पता ही होगा कि लाखों की भीड़ मौजूद है, जो हिंसक हो सकती है.
=================
बाबे के बारे में अथवा उनकी राजनीति के बारे में कुछ कहना जल्दबाजी होगी... क्योंकि उनके लिए अभी भी उच्च न्यायालयों के रास्ते खुले हैं.. लेकिन जो हिंसा-आगज़नी-अव्यवस्था चल रही है, उस बारे में कई मित्रों की वाल पर यह सुझाव पढ़ा, उसमे दम लगता है कि अगर "माननीय" चाहते और थोड़ी सामाजिक जिम्मेदारी दिखाते हुए कुछ चतुराई दिखाते तो इस हिंसाचार रोका जा सकता था... क्योंकि "स्टे-ऑर्डर देना" और "फैसला सुरक्षित" रखने की तो आदत है इनको... वो बात और है कि जिसके आगे हिन्दू नाम जुड़ जाए उसको ये छोड़ते नहीं, और जिसके आगे मुस्लिम या ईसाई नाम जुड़ जाए, उसे ये छेड़ते नहीं.....
- सुरेश चिपलूनकर
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यह सारी दुनिया को पता है कि भारत के "माननीय न्यायालय" स्टे-ऑर्डर देने में तथा फैसले सुरक्षित रखने में "माहिर" होते हैं. बाबा रामरहीम के इस मामले में भी "माननीय" चाहते तो बड़े आराम से फैसला एक माह या पन्द्रह दिन सुरक्षित रख लेते... मुझे तो नहीं लगता कि भीड़ बार-बार एकत्रित हो सकती है... भीड़ को कभी न कभी तो थकना ही है.... "माननीय" कोई भी कानूनी तकनीकी पेंच फँसाकर मामले को तब तक टालते जाते, जब तक की बाबे के भक्तों की भीड़ बोर होकर कम होने लगती, या हरियाणा सरकार कोई पुख्ता व्यवस्था कर लेती...
माना कि खट्टर और कैप्टन सरकार भीड़ को एकत्रित होने से रोकने में नाकाम रही, इनका इंटेलीजेंस भी फेल रहा... लेकिन कोर्ट के "माननीय" किसी दूसरी दुनिया में तो नहीं रहते हैं, उन्हें भी आम लोगों की तरह, पता ही होगा कि लाखों की भीड़ मौजूद है, जो हिंसक हो सकती है.
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बाबे के बारे में अथवा उनकी राजनीति के बारे में कुछ कहना जल्दबाजी होगी... क्योंकि उनके लिए अभी भी उच्च न्यायालयों के रास्ते खुले हैं.. लेकिन जो हिंसा-आगज़नी-अव्यवस्था चल रही है, उस बारे में कई मित्रों की वाल पर यह सुझाव पढ़ा, उसमे दम लगता है कि अगर "माननीय" चाहते और थोड़ी सामाजिक जिम्मेदारी दिखाते हुए कुछ चतुराई दिखाते तो इस हिंसाचार रोका जा सकता था... क्योंकि "स्टे-ऑर्डर देना" और "फैसला सुरक्षित" रखने की तो आदत है इनको... वो बात और है कि जिसके आगे हिन्दू नाम जुड़ जाए उसको ये छोड़ते नहीं, और जिसके आगे मुस्लिम या ईसाई नाम जुड़ जाए, उसे ये छेड़ते नहीं.....
- सुरेश चिपलूनकर
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