1971 में एक "फ़िल्म" आयी थी #आनन्द जिसमें राजेश खन्ना का एक कालजयी डायलॉग था-
"बाबू मोशाय, ज़िंदगी और मौत तो ऊपर वाले के हाथ में हैं, उसे ना तो आप बदल सकते हैं ना मैं, हम सब तो रंगमंच की कठपुतली हैं जिनकी डोर ऊपर वाले की उंगलियों में बंधी है।"
एक "फिल्म" बनाने के पूर्व सबसे पहले उसकी "कहानी" लिखी जाती है और कहानी पूरी हो जाने के बाद उस कहानी को "अभिनेताओ" पर "फिल्माया" जाता है। जीवन का तो पता नहीं पर हर "फ़िल्म" के पात्र की भूमिका जरूर पहले से तय होती हैं और जैसा "फ़िल्म" का निर्देशक चाहता है अभिनेता वैसी ही भूमिका निभाता है।
पर दुनिया के इतिहास में ऐसी अनेक घटनाएं घटी है जब लगा कि "आनन्द फ़िल्म'' का ये डायलॉग यथार्थ जीवन में भी उतना ही सच हैं जितना उस "फिल्म'' में था। आज से 73 साल पहले 20 अगस्त 1944 को जन्मे #राजीव_गांधी के जीवन के बारे मे भी एक 'पटकथा' लिखी गयी थी, जिसका फिल्मांकन 1984 से शुरू हुआ था।
12 मई 1991 को तिरूवल्लूवर के अरुकोणम मे विश्वनाथ प्रतापसिंह और करुणानिधि की रैली थी। इस रैली मे "धनु" नाम की एक तमिल लड़की ने 'विश्वनाथ प्रताप सिंह' को माला पहनाकर पैर छुऐ। क्योकि "21मई" को श्रीपेरम्बदूर मे राजीव गांधी की चुनावी रैली का आयोजन था और धनु "पूर्वाभ्यास" कर रही थी, उस पटकथा का जो आज से #462_साल_पहले_लिखी_गयी_थी...।
उसका पूर्वाभ्यास सफल रहा, जैसे एक खिलाड़ी अंतिम मैच से पहले "नेट प्रेक्टिस" करता है या एक सांईस्टिस्ट किसी दवा को मरीज को देने से पहले "जानवरो" पर उसका "परीक्षण" करता है।
1984 मे राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद तमिलनाडु मे श्रीलंका के तमिल शरणार्थियो की बाड़ सी आ गयी थी। श्रीलंका मे जारी "गृहयुद्ध" से बचने के लिये लाखो तमिलो ने भारत मे शरण ली। राजीव गांधी ने इस गृहयुद्ध को खत्म करने के उद्देश्य से जुलाई 1987 मे श्रीलंका के राष्ट्रपति #जेआर_जयवर्धने के साथ एक "समझौता" किया। इस समझौते के तहत "इंडियन पीस कीपिंग फोर्स" [IPKF] या #शांति_सेना को "लिबरेशन टाईगर्स ऑफ तमिल ईलम" या लिट्टे [LTTE] और अन्य तमिल उग्रवादियो के हथियार डलवाकर शांति बहाल करना थी, पर लिट्टे और तमिल इस समझौते के विरूद्ध थे। इस समझौते की शाम ही श्रीलंका के नौसैनिक #विजीथा_रोहाना ने राजीव गांधी पर बंदूक की बट से हमला कर दिया जब वे परेड की सलामी ले रहे थे। ये घटना बता रही थी कि राजीव गांधी के इस निर्णय से श्रीलंकाई तमिलो मे कितनी नाराजगी थी और इस घटना ने उस #खूनी_भविष्य के बारे मे दुनिया को आगाह कर दिया था जो कि राजीव गांधी के जन्म लेने से "चार शताब्दी पूर्व" ही लिखा जा चुका था ।
श्रीलंका मे शांति सेना भेजने से पहले लिट्टे प्रमुख "वेलुपिल्लई प्रभाकरण" दिल्ली मे राजीव गांधी से मिलने आये। राजीव प्रभाकरण के साथ बड़ी बेरुखी से मिले और उन्होने प्रभाकरण से इस समझौते को मानने को कहा। किंतु प्रभाकरण ने तमिल हितो की खातिर इस समझौते को मानने से इंकार कर दिया, तब राजीव ने प्रभाकरण को उसी होटल मे नजरबंद कर दिया जहां वो ठहरे थे। राजीव ने प्रभाकरण को तब छोड़ा जब उन्होने शर्ते मान लेने का आश्वासन दिया। प्रभाकरण ने उस वक्त तो "हां" कह दी और वे वहां से छूटकर श्रीलंका पहुंच गये पर उसी दिन से प्रभाकरण ने राजीव को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मान लिया, क्योकि लिट्टे श्रीलंका मे सिंहलियो द्वारा तमिलो के साथ किये जा रहे भेदभाव के खिलाफ 1976 से ही संघर्ष कर रहा था और उसे आशा थी कि भारत तमिलो का इस संघर्ष मे साथ देगा...पर हुआ उल्टा , #भारत_तमिलो_के_विरूद्ध_सिंहलियो_के_साथ_खडा़_हो_गया।
इस समझौते के बाद राजीव ने श्रीलंका मे शांति सेना भेजी, बिना किसी योजना, बिना लिट्टे की शक्ति जाने, भारतीय शांति सेना को न श्रीलंका की भौगोलिक स्थिति का पता था और न उसे घने जंगलो मे लिट्टे के उग्रवादियो से लड़ने की कोई ट्रेनिंग दी गयी, नतीजतन जो सेना वहां शांति स्थापना करने गयी थी वो वहां एक अनचाहे युद्ध मे फंस गयी। इस अंधे युद्ध मे भारतीय शांति सेना के लगभग 1500 सैनिक शहीद हो गये। लिट्टे के भी हजारो सैनिक और निर्दोष तमिल नागरिक इस युद्ध के दौरान मारे गये। अपने ही देश से गये नागरिको के साथ इस तरह के खूनी संघर्ष का दुनिया मे दूसरा उदाहरण मिलना असंभव है।
इस खूनी संघर्ष से भारत और श्रीलंका दोनो ही देशो मे शांति सेना को लेकर राजनीति मे उबाल आ गया। कहा तो ये तक जाता है कि भारतीय शांति सेना को नुकसान पहुंचाने के लिये #लिट्टे_और_श्रीलंका_सेना_ने_अघोषित_रूप_से_हाथ_मिला_लिया_था, ताकि भारतीय शांति सेना पराजित होकर यहां से वापस लौट जाये।
1989 के आम लोकसभा चुनाव मे राजीव के विरोधी विश्वनाथ प्रताप सिंह ने चुनाव मे वादा किया कि वे यदि प्रधानमंत्री बने तो वे तुरंत शांति सेना को वापस बुला लेगें।
बोफोर्स घोटाले की आंच से राजीव चुनाव हार गये। वीपी सिंह ने चुनाव मे किये वादे के अनुसार श्रीलंका के राष्ट्रपति "रणसिंघे प्रेमदासा" के अनुरोध पर शांति सेना 1990मे वापस बुला ली, किंतु #मंडल_और_कमंडल की "राजनीति" के उफान के बाद वीपी सिंह और बाद मे चंद्रशेखर की सरकार गिर गई, और इसके साथ ही नयी लोकसभा चुनाव की घोषणा हो गयी। लिट्टे को लगा कि यदि राजीव दोबारा सत्ता मे लौटे तो वे श्रीलंका मे फिर से सेना भेज देगें। बौखलाए प्रभाकरण ने तब एक बेहद खतरनाक षड़यंत्र रचने की योजना बनाई, जिसको पूरा करने की जिम्मेदारी 'शिवरासन' को दी। शिवरासन ने धनु, नलिनी मुरुगन, संथन, पेरारिवलन, हरिबाबू और कुछ अन्य तमिल उग्रवादियो के साथ मिलकर इस योजना पर काम करना शुरू कर दिया ।
शिवरासन ने राजीव की हत्या मानव बम से करने की योजना बनाई पर उसे ऐसा मानव बम मिलना मुश्किल हो रहा था जो आसानी से राजीव तक पहुंच जाये, तब शिवरासन ने अपनी ही चचेरी बहनो धनु और शुभा को इस काम के लिये चुना, क्योकि "राजीव की मृत्यु'' एक "महिला के हाथो" ही होना थी क्योकि "नियति" मे यह पहले ही लिखा जा चुका था।
शिवरासन ने बम बनाने की जिम्मेदारी लिट्टे के #बम_एक्सपर्ट 'अरिवू' को दी, उसे ऐसा बम तैयार करने को कहा जो कमर मे पहना जा सके। अरिवू ने वह बम तैयार कर दिया। इसी बम से भरे बेल्ट के साथ धनु ने वीपी सिंह के पैर छुऐ थे, बस बटन नही दबाया था।
21मई को राजीव की श्रीपेरम्बदूर मे सभा तय हो चुकी थी। धनु ने घटना को अंजाम देने के लिये एक ढीला कुर्ता सिलवाया, जिसके अंदर बम से भरी बेल्ट को पहना जा सके। 20 मई की रात उन्होने भी एक "फिल्म" देखी और सो गये। वे इस घटना से अनजान थे कि वे खुद एक "बड़ी फिल्म" की कहानी मे अपनी भूमिका निभा रहे है। सुबह वे अपनी साजिश को पूरा करने निकल पड़े।
राजीव को सभा मे आने मे देर हो गयी। बार बार उनके आने की घोषणा हो रही थी। रात 11बजे राजीव सभा मे पहुंच गये। सभी साजिशकर्ता वहां पहले से ही मौजूद थे। लोग उनसे मिलने को धक्का मुक्की मचा रहे थे। शिवरासन ने धनु को योजना पूरा करने का इशारा किया। धनु राजीव की ओर बड़ी परंतु महिला सुरक्षाकर्मियो ने उसे रोकना चाहा। राजीव ने सुरक्षाकर्मियो को टोकते हुऐ धनु को अपने पास आने दिया। हरिबाबू अपने कैमरे से उस घटना के फोटो खीच रहा था जिसे कि #तमिल_संघर्ष_के_इतिहास_मे_लिखने_का_उससे_वादा_किया_गया_था। धनु ने तय योजना के अनुसार राजीव को "चंदन की माला पहनाई" और उनके "पैर छुऐ"। राजीव उसे उठाने के लिये झुके, धनु को बस इसी क्षण का इंतजार था उसने बटन दबा दिया, एक जोरदार धमाका हुआ, चारो और धुंआ छा गया, जब धुआं छटा तो राजीव की तलाश की गयी, उनका शरीर एक ओर पड़ा था जबकि सर दूसरी ओर, आगे से उनका चेहरा पूरी तरह उड़ गया था। चारो ओर चीख पुकार मच गयी थी, हरिबाबू भी उस विस्फोट मे मारा गया, उसका कैमरा वहीं गिर गया और उसके कैमरे से खीची गयी तस्वीरो ने ही गुनाहगारो के सारे राज से पर्दा उठाया।
21मई 1991 की ये घटना उस कहानी का अंतिम भाग था जिसे पूरा होने मे पूरे 436 साल लग गये थे। राजीव का "श्रीलंका मे शांति सेना" भेजना "सही" था या "गलत', "प्रभाकरण" और "लिट्टे की ताकत" का सटीक अंदाजा लगाये बिना "युद्ध मे कूद जाना",1500 सैनिको की शहादत, वह भी अपने ही देश के नागरिको के साथ लड़ते हुऐ, इस पर आज भी बहस की जाती है, क्योकि हम केवल वर्तमान ही देख पाते है और समझते है कि ऐसा कर लेते तो वैसा हो जाता, वैसा करते तो ऐसा होता, पर कुछ चीजे पहले से तय होती है, जिन्हे भोगना हमारी नियति मे लिखा होता है। राजीव हत्याकांड भी ऐसी ही एक नियति का सच था जिसे कि #1555मे_ही_इन_शब्दो_मे_लिखा_जा_चुका_था-
''एक पायलट भारी बहुमत के साथ सत्ता मे आयेगा,
अपना व्यवसाय छोड़कर वह राज्य की सत्ता के सर्वोच्च पद पर होगा,
पर सात साल बाद वह काउंटरमेंडेड (चुनाव प्रचार के दौरान मृत)हो जायेगा,
एक बर्बर सेना उसके विरूद्ध ऐसा कार्य करेगी कि वेनिस(इटली) आतंकित हो उठेगा।"
- (सेंचुरी 6 छंद75)
"बदले की भावना से भरी वह महिला अपने राजनेता के विरूद्ध षड़यंत्र रचेगी,
उस राज को वह अपने तक ही सीमित रखेगी,
परंतु षड़यंत्रकर्ताओ का पता लग जायेगा,
पर तब तक सत्रह शहीद हो चुके होगें।"
- (सेंचुरी 6 छंद 59)
"अचानक ही छिपा हुआ षड़यंत्र भीषण आतंक के रूप मे सामने आयेगा,
कोयले जैसे काले रंग की लड़की हमेशा के लिये गायब हो जायेगी,
धीरे धीरे शक्तिशाली लोग उस संगठन से नाराज होते चले जायेगें।"
- (सेंचुरी 5 छंद 65)
-माईकल दी नास्त्रेदमस
फ्रांस 4 मई 1555
उपर्युक्त लाईने राजीव पर अक्षरश: वैसे ही सही बैठी जैसी कि लिखी गयी थी-
राजीव पायलट थे, इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुऐ लोकसभा चुनाव मे वे 1984 मे 50% वोट के साथ 404 सीटो पर जीतने के बाद प्रधानमंत्री बने, सात साल बाद 1991मे चुनाव प्रचार के दौरान मारे गये,
लिट्टे जो एक खूंखार संगठन था उसने ये सारा षड़यंत्र रचा, वेनिस इटली का शहर है और सोनिया इटली की ही रहने वाली है, इस घटना के बाद वे आंतकित होकर राजनीति से बहुत समय तक दूर रही,
धनु शांतिसेना की कार्यवाई के बाद बदले की आग मे जल रही थी, उसने ही राजीव के विरूद्ध षड़यंत्र मे मुख्य भूमिका निभाई, बम विस्फोट मे करीब सत्रह लोग मारे गये थे, पर हरिबाबू के कैमरे की वजह से सारा राज खुल गया,
बम विस्फोट से षड़यंत्र अपने खूनी रूप मे सामने आया,
धनु तमिल थी, और तमिलो का रंग कृष्ण वर्ण का होता है,
बम विस्फोट मे उसके भी चिथड़े उड़ने से वह गायब हो गयी,
इस घटना के बाद भारत और पूरी दुनिया मे लिट्टे के खिलाफ माहौल बनने लगा,
जो अंत मे 2009 मे उसके खात्मे का कारण बना। 26 साल पहले 21 मई 1991 के दिन ये घटना भारत और दुनिया के इतिहास मे हमेशा के लिये दर्ज हो गयी थी।
कहा जाता है कि नास्त्रेदमस की भविष्यवाणियो के अनेक जानकारो ने राजीव गांधी को उस समय चेतावनी भी दी थी कि वे सातवे साल मे वेनिस की यात्रा के दौरान सतर्क रहे, उनके जीवन को खतरा हो सकता है,
पर जैसा कि हर बार होता है #महान_फ्रांसीसी_भविष्यवक्ता_नास्त्रेदमस की भविष्यवाणी तब ही पूरी तरह समझ आती है, जब वह वास्तविक जीवन मे घट जाती है क्योकि नास्त्रेदमस भले ही सारे भविष्य को जानते थे पर वे समय की धारा को अपनी ही गति से अविरल बहने देना चाहते थे, यही कारण था कि उन्होने अपनी हर "भविष्यवाणी" 'गूढ़' और 'सांकेतिक' शब्दो मे लिखी क्योकि शायद वे भी #नियति_को_बदलना_नही_चाहते_थे...।
"बाबू मोशाय, ज़िंदगी और मौत तो ऊपर वाले के हाथ में हैं, उसे ना तो आप बदल सकते हैं ना मैं, हम सब तो रंगमंच की कठपुतली हैं जिनकी डोर ऊपर वाले की उंगलियों में बंधी है।"
एक "फिल्म" बनाने के पूर्व सबसे पहले उसकी "कहानी" लिखी जाती है और कहानी पूरी हो जाने के बाद उस कहानी को "अभिनेताओ" पर "फिल्माया" जाता है। जीवन का तो पता नहीं पर हर "फ़िल्म" के पात्र की भूमिका जरूर पहले से तय होती हैं और जैसा "फ़िल्म" का निर्देशक चाहता है अभिनेता वैसी ही भूमिका निभाता है।
पर दुनिया के इतिहास में ऐसी अनेक घटनाएं घटी है जब लगा कि "आनन्द फ़िल्म'' का ये डायलॉग यथार्थ जीवन में भी उतना ही सच हैं जितना उस "फिल्म'' में था। आज से 73 साल पहले 20 अगस्त 1944 को जन्मे #राजीव_गांधी के जीवन के बारे मे भी एक 'पटकथा' लिखी गयी थी, जिसका फिल्मांकन 1984 से शुरू हुआ था।
12 मई 1991 को तिरूवल्लूवर के अरुकोणम मे विश्वनाथ प्रतापसिंह और करुणानिधि की रैली थी। इस रैली मे "धनु" नाम की एक तमिल लड़की ने 'विश्वनाथ प्रताप सिंह' को माला पहनाकर पैर छुऐ। क्योकि "21मई" को श्रीपेरम्बदूर मे राजीव गांधी की चुनावी रैली का आयोजन था और धनु "पूर्वाभ्यास" कर रही थी, उस पटकथा का जो आज से #462_साल_पहले_लिखी_गयी_थी...।
उसका पूर्वाभ्यास सफल रहा, जैसे एक खिलाड़ी अंतिम मैच से पहले "नेट प्रेक्टिस" करता है या एक सांईस्टिस्ट किसी दवा को मरीज को देने से पहले "जानवरो" पर उसका "परीक्षण" करता है।
1984 मे राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद तमिलनाडु मे श्रीलंका के तमिल शरणार्थियो की बाड़ सी आ गयी थी। श्रीलंका मे जारी "गृहयुद्ध" से बचने के लिये लाखो तमिलो ने भारत मे शरण ली। राजीव गांधी ने इस गृहयुद्ध को खत्म करने के उद्देश्य से जुलाई 1987 मे श्रीलंका के राष्ट्रपति #जेआर_जयवर्धने के साथ एक "समझौता" किया। इस समझौते के तहत "इंडियन पीस कीपिंग फोर्स" [IPKF] या #शांति_सेना को "लिबरेशन टाईगर्स ऑफ तमिल ईलम" या लिट्टे [LTTE] और अन्य तमिल उग्रवादियो के हथियार डलवाकर शांति बहाल करना थी, पर लिट्टे और तमिल इस समझौते के विरूद्ध थे। इस समझौते की शाम ही श्रीलंका के नौसैनिक #विजीथा_रोहाना ने राजीव गांधी पर बंदूक की बट से हमला कर दिया जब वे परेड की सलामी ले रहे थे। ये घटना बता रही थी कि राजीव गांधी के इस निर्णय से श्रीलंकाई तमिलो मे कितनी नाराजगी थी और इस घटना ने उस #खूनी_भविष्य के बारे मे दुनिया को आगाह कर दिया था जो कि राजीव गांधी के जन्म लेने से "चार शताब्दी पूर्व" ही लिखा जा चुका था ।
श्रीलंका मे शांति सेना भेजने से पहले लिट्टे प्रमुख "वेलुपिल्लई प्रभाकरण" दिल्ली मे राजीव गांधी से मिलने आये। राजीव प्रभाकरण के साथ बड़ी बेरुखी से मिले और उन्होने प्रभाकरण से इस समझौते को मानने को कहा। किंतु प्रभाकरण ने तमिल हितो की खातिर इस समझौते को मानने से इंकार कर दिया, तब राजीव ने प्रभाकरण को उसी होटल मे नजरबंद कर दिया जहां वो ठहरे थे। राजीव ने प्रभाकरण को तब छोड़ा जब उन्होने शर्ते मान लेने का आश्वासन दिया। प्रभाकरण ने उस वक्त तो "हां" कह दी और वे वहां से छूटकर श्रीलंका पहुंच गये पर उसी दिन से प्रभाकरण ने राजीव को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मान लिया, क्योकि लिट्टे श्रीलंका मे सिंहलियो द्वारा तमिलो के साथ किये जा रहे भेदभाव के खिलाफ 1976 से ही संघर्ष कर रहा था और उसे आशा थी कि भारत तमिलो का इस संघर्ष मे साथ देगा...पर हुआ उल्टा , #भारत_तमिलो_के_विरूद्ध_सिंहलियो_के_साथ_खडा़_हो_गया।
इस समझौते के बाद राजीव ने श्रीलंका मे शांति सेना भेजी, बिना किसी योजना, बिना लिट्टे की शक्ति जाने, भारतीय शांति सेना को न श्रीलंका की भौगोलिक स्थिति का पता था और न उसे घने जंगलो मे लिट्टे के उग्रवादियो से लड़ने की कोई ट्रेनिंग दी गयी, नतीजतन जो सेना वहां शांति स्थापना करने गयी थी वो वहां एक अनचाहे युद्ध मे फंस गयी। इस अंधे युद्ध मे भारतीय शांति सेना के लगभग 1500 सैनिक शहीद हो गये। लिट्टे के भी हजारो सैनिक और निर्दोष तमिल नागरिक इस युद्ध के दौरान मारे गये। अपने ही देश से गये नागरिको के साथ इस तरह के खूनी संघर्ष का दुनिया मे दूसरा उदाहरण मिलना असंभव है।
इस खूनी संघर्ष से भारत और श्रीलंका दोनो ही देशो मे शांति सेना को लेकर राजनीति मे उबाल आ गया। कहा तो ये तक जाता है कि भारतीय शांति सेना को नुकसान पहुंचाने के लिये #लिट्टे_और_श्रीलंका_सेना_ने_अघोषित_रूप_से_हाथ_मिला_लिया_था, ताकि भारतीय शांति सेना पराजित होकर यहां से वापस लौट जाये।
1989 के आम लोकसभा चुनाव मे राजीव के विरोधी विश्वनाथ प्रताप सिंह ने चुनाव मे वादा किया कि वे यदि प्रधानमंत्री बने तो वे तुरंत शांति सेना को वापस बुला लेगें।
बोफोर्स घोटाले की आंच से राजीव चुनाव हार गये। वीपी सिंह ने चुनाव मे किये वादे के अनुसार श्रीलंका के राष्ट्रपति "रणसिंघे प्रेमदासा" के अनुरोध पर शांति सेना 1990मे वापस बुला ली, किंतु #मंडल_और_कमंडल की "राजनीति" के उफान के बाद वीपी सिंह और बाद मे चंद्रशेखर की सरकार गिर गई, और इसके साथ ही नयी लोकसभा चुनाव की घोषणा हो गयी। लिट्टे को लगा कि यदि राजीव दोबारा सत्ता मे लौटे तो वे श्रीलंका मे फिर से सेना भेज देगें। बौखलाए प्रभाकरण ने तब एक बेहद खतरनाक षड़यंत्र रचने की योजना बनाई, जिसको पूरा करने की जिम्मेदारी 'शिवरासन' को दी। शिवरासन ने धनु, नलिनी मुरुगन, संथन, पेरारिवलन, हरिबाबू और कुछ अन्य तमिल उग्रवादियो के साथ मिलकर इस योजना पर काम करना शुरू कर दिया ।
शिवरासन ने राजीव की हत्या मानव बम से करने की योजना बनाई पर उसे ऐसा मानव बम मिलना मुश्किल हो रहा था जो आसानी से राजीव तक पहुंच जाये, तब शिवरासन ने अपनी ही चचेरी बहनो धनु और शुभा को इस काम के लिये चुना, क्योकि "राजीव की मृत्यु'' एक "महिला के हाथो" ही होना थी क्योकि "नियति" मे यह पहले ही लिखा जा चुका था।
शिवरासन ने बम बनाने की जिम्मेदारी लिट्टे के #बम_एक्सपर्ट 'अरिवू' को दी, उसे ऐसा बम तैयार करने को कहा जो कमर मे पहना जा सके। अरिवू ने वह बम तैयार कर दिया। इसी बम से भरे बेल्ट के साथ धनु ने वीपी सिंह के पैर छुऐ थे, बस बटन नही दबाया था।
21मई को राजीव की श्रीपेरम्बदूर मे सभा तय हो चुकी थी। धनु ने घटना को अंजाम देने के लिये एक ढीला कुर्ता सिलवाया, जिसके अंदर बम से भरी बेल्ट को पहना जा सके। 20 मई की रात उन्होने भी एक "फिल्म" देखी और सो गये। वे इस घटना से अनजान थे कि वे खुद एक "बड़ी फिल्म" की कहानी मे अपनी भूमिका निभा रहे है। सुबह वे अपनी साजिश को पूरा करने निकल पड़े।
राजीव को सभा मे आने मे देर हो गयी। बार बार उनके आने की घोषणा हो रही थी। रात 11बजे राजीव सभा मे पहुंच गये। सभी साजिशकर्ता वहां पहले से ही मौजूद थे। लोग उनसे मिलने को धक्का मुक्की मचा रहे थे। शिवरासन ने धनु को योजना पूरा करने का इशारा किया। धनु राजीव की ओर बड़ी परंतु महिला सुरक्षाकर्मियो ने उसे रोकना चाहा। राजीव ने सुरक्षाकर्मियो को टोकते हुऐ धनु को अपने पास आने दिया। हरिबाबू अपने कैमरे से उस घटना के फोटो खीच रहा था जिसे कि #तमिल_संघर्ष_के_इतिहास_मे_लिखने_का_उससे_वादा_किया_गया_था। धनु ने तय योजना के अनुसार राजीव को "चंदन की माला पहनाई" और उनके "पैर छुऐ"। राजीव उसे उठाने के लिये झुके, धनु को बस इसी क्षण का इंतजार था उसने बटन दबा दिया, एक जोरदार धमाका हुआ, चारो और धुंआ छा गया, जब धुआं छटा तो राजीव की तलाश की गयी, उनका शरीर एक ओर पड़ा था जबकि सर दूसरी ओर, आगे से उनका चेहरा पूरी तरह उड़ गया था। चारो ओर चीख पुकार मच गयी थी, हरिबाबू भी उस विस्फोट मे मारा गया, उसका कैमरा वहीं गिर गया और उसके कैमरे से खीची गयी तस्वीरो ने ही गुनाहगारो के सारे राज से पर्दा उठाया।
21मई 1991 की ये घटना उस कहानी का अंतिम भाग था जिसे पूरा होने मे पूरे 436 साल लग गये थे। राजीव का "श्रीलंका मे शांति सेना" भेजना "सही" था या "गलत', "प्रभाकरण" और "लिट्टे की ताकत" का सटीक अंदाजा लगाये बिना "युद्ध मे कूद जाना",1500 सैनिको की शहादत, वह भी अपने ही देश के नागरिको के साथ लड़ते हुऐ, इस पर आज भी बहस की जाती है, क्योकि हम केवल वर्तमान ही देख पाते है और समझते है कि ऐसा कर लेते तो वैसा हो जाता, वैसा करते तो ऐसा होता, पर कुछ चीजे पहले से तय होती है, जिन्हे भोगना हमारी नियति मे लिखा होता है। राजीव हत्याकांड भी ऐसी ही एक नियति का सच था जिसे कि #1555मे_ही_इन_शब्दो_मे_लिखा_जा_चुका_था-
''एक पायलट भारी बहुमत के साथ सत्ता मे आयेगा,
अपना व्यवसाय छोड़कर वह राज्य की सत्ता के सर्वोच्च पद पर होगा,
पर सात साल बाद वह काउंटरमेंडेड (चुनाव प्रचार के दौरान मृत)हो जायेगा,
एक बर्बर सेना उसके विरूद्ध ऐसा कार्य करेगी कि वेनिस(इटली) आतंकित हो उठेगा।"
- (सेंचुरी 6 छंद75)
"बदले की भावना से भरी वह महिला अपने राजनेता के विरूद्ध षड़यंत्र रचेगी,
उस राज को वह अपने तक ही सीमित रखेगी,
परंतु षड़यंत्रकर्ताओ का पता लग जायेगा,
पर तब तक सत्रह शहीद हो चुके होगें।"
- (सेंचुरी 6 छंद 59)
"अचानक ही छिपा हुआ षड़यंत्र भीषण आतंक के रूप मे सामने आयेगा,
कोयले जैसे काले रंग की लड़की हमेशा के लिये गायब हो जायेगी,
धीरे धीरे शक्तिशाली लोग उस संगठन से नाराज होते चले जायेगें।"
- (सेंचुरी 5 छंद 65)
-माईकल दी नास्त्रेदमस
फ्रांस 4 मई 1555
उपर्युक्त लाईने राजीव पर अक्षरश: वैसे ही सही बैठी जैसी कि लिखी गयी थी-
राजीव पायलट थे, इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुऐ लोकसभा चुनाव मे वे 1984 मे 50% वोट के साथ 404 सीटो पर जीतने के बाद प्रधानमंत्री बने, सात साल बाद 1991मे चुनाव प्रचार के दौरान मारे गये,
लिट्टे जो एक खूंखार संगठन था उसने ये सारा षड़यंत्र रचा, वेनिस इटली का शहर है और सोनिया इटली की ही रहने वाली है, इस घटना के बाद वे आंतकित होकर राजनीति से बहुत समय तक दूर रही,
धनु शांतिसेना की कार्यवाई के बाद बदले की आग मे जल रही थी, उसने ही राजीव के विरूद्ध षड़यंत्र मे मुख्य भूमिका निभाई, बम विस्फोट मे करीब सत्रह लोग मारे गये थे, पर हरिबाबू के कैमरे की वजह से सारा राज खुल गया,
बम विस्फोट से षड़यंत्र अपने खूनी रूप मे सामने आया,
धनु तमिल थी, और तमिलो का रंग कृष्ण वर्ण का होता है,
बम विस्फोट मे उसके भी चिथड़े उड़ने से वह गायब हो गयी,
इस घटना के बाद भारत और पूरी दुनिया मे लिट्टे के खिलाफ माहौल बनने लगा,
जो अंत मे 2009 मे उसके खात्मे का कारण बना। 26 साल पहले 21 मई 1991 के दिन ये घटना भारत और दुनिया के इतिहास मे हमेशा के लिये दर्ज हो गयी थी।
कहा जाता है कि नास्त्रेदमस की भविष्यवाणियो के अनेक जानकारो ने राजीव गांधी को उस समय चेतावनी भी दी थी कि वे सातवे साल मे वेनिस की यात्रा के दौरान सतर्क रहे, उनके जीवन को खतरा हो सकता है,
पर जैसा कि हर बार होता है #महान_फ्रांसीसी_भविष्यवक्ता_नास्त्रेदमस की भविष्यवाणी तब ही पूरी तरह समझ आती है, जब वह वास्तविक जीवन मे घट जाती है क्योकि नास्त्रेदमस भले ही सारे भविष्य को जानते थे पर वे समय की धारा को अपनी ही गति से अविरल बहने देना चाहते थे, यही कारण था कि उन्होने अपनी हर "भविष्यवाणी" 'गूढ़' और 'सांकेतिक' शब्दो मे लिखी क्योकि शायद वे भी #नियति_को_बदलना_नही_चाहते_थे...।
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