दूरदर्शन के युग में जब ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ शुरू होता था तब बिन बुलाये मेहमान की तरह लगता था | यह दरअसल होता भी एक फिलर की तरह था | दो कार्यक्रमों के बीच खाली जगह में चला दिया जाता था | आज यह बेशक किसी कीमती दस्तावेज सा लगता है लेकिन उस दौर में तो बोरियत और कोफ़्त ही पैदा करता था |
और यह बोरियत उस वक्त अपने पीक पर होती थी जब ‘तमिल’ वाले भाग में डॉ. बालमुरलीकृष्ण समंदर के किनारे ‘इसैन्ताल नम इरुवरिन सुरमुम नमताकुम्’ गाते हुए प्रकट होते थे | इस भाग में जिन लोगों को यह गान सुनते हुए दिखाया जाता था, उनमें कमल हसन भी थे लेकिन मैं उन्हें काफी सालों बाद चीन्ह पाया | बिना मूंछों के जो थे |
‘साथिया तूने क्या किया’ वाली रेवती भी थीं, जिनको ‘नमन रहेगा निजी कारणों से | बाद में यह भी पता चला....पता क्या चला मैंने ही पता किया कि इसमें टेनिस प्लेयर रामनाथ कृष्णन भी थे, जिनके सुपुत्र रमेश कृष्णन को नब्बे के दशक में विम्बल्डन और डेविस कप के डबल्स में लिएंडर पेस के साथ खेलते देखा था |
इसके बाद चट्टानों के नृत्य वाला दृश्य आता था और डूबते-तैरते हाथी कौतूहल पैदा करते थे | कलकत्ता की मेट्रो से बड़ी नफासत से उतरते हुए अरुण लाल भी नजर आते थे | उस वक्त ब्लैक एंड व्हाइट टीवी पर मेट्रो को देखना छोटे शहर में रहते हुए बड़े शहरों की खासकर कलकत्ता की तरक्की के बारे में सुंदर धारणा निर्मित करता था | इसके बाद यह गाना पूर्वोत्तर की शांत वादियों में ले जाता जय, जहाँ संभवत: नागा समुदाय समूह में ठहरे हुए पानी की पृष्ठभूमि में नृत्य कर रहा होता है |
फिर इस गाने में वह स्टेज आती थी, जब लगता था कि अब बस इस बोझिल कार्यक्रम का अंत होने ही वाला है | सारे दृश्य गोवा की मस्ती भरी, समुद्रीय और आधुनिक जीवन शैली की तरफ शिफ्ट हो जाते थे | इसमें गोवा के एक मशहूर कार्टूनिस्ट और पेंटर मारिओ मिरांडा को भी दिखाया गया है, चित्रकारी करते हुए | पद्मभूषण से सम्मानित मिरांडा साहब के बारे में तब ज्ञात हुआ जब २०११ में उनका निधन हुआ |
तत्पश्चात मल्लिका साराभाई की गुजराती एंट्री होती है | वे उस वक्त डराती हुई लगती थीं | बड़ी-बड़ी आँखें, बड़ी बिंदी, खुले हुए बाल और तिस पर उनके बोल कि ‘मणे सूर जो तारो मारो, बने आपनो सूर निराणों” | पता नहीं इतना क्रोध में उन्होंने क्यों परफॉर्म किया उन्होंने ?
बहरहाल सीन में अब उस वक्त की हाई स्पीड रेल की एंट्री होती है लेकिन स्लो मोशन में और इस दृश्य के पार तनूजा होती हैं, जो मराठी में “माझ्या तुमच्या जुळता तारा, मधुर सुरांच्या बरसती धारा” गा रही होती हैं | वे मूल रूप से बंगाली हैं लेकिन उन्होंने इस गान में मराठी भाषा का प्रतिनिधित्व किया है | एक गैर मराठी ने महाराष्ट्र का प्रतिनिधित्व किया, मैं सोच सकता हूँ कि तब राज और उद्धव छोटे छोटे ही रहे होंगे |
यह यात्रा अपने अंतिम पड़ाव की ओर तब अग्रसर होती हुई प्रतीत होने लगती थी जब लता जी की आवाज में हिन्दी सिनेमा की नामचीन और तारिकाएँ वहीदा रहमान, हेमा मालिनी और शर्मीला टैगोर परदे पर नमूदार होतीं थीं | और अंत में स्वयं लता जी जब माइक के सामने इस गाने को समाप्त करतीं है तब उनके उनके चेहरे के भाव, ठहराव और आवाज के उतार-चढ़ाव बताते हैं कि जो लोग बीते सत्तर वर्षों से इस देश के लिए किसी तटबंध से खड़े रहे हैं उनमें लता जी भी एक हैं |
और फाइनली जिस एक वजह से ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ को कई दफा देखा जा सकता था, वह वजह थी – अमिताभ बच्चन-जितेन्द्र-मिथुन चक्रवर्ती की तिकड़ी | जो इस समूचे आयोजन में तमाम अजनबियों के बीच बेहद अपने से और ख़ास लगते थे, जिनको देखकर मुझे डबल खुशी होती थी | एक तो यह कि इन सितारों के दर्शन हो गए और दूसरा यह कि कुछ ही सेकंड में इस ‘सभा का समापन’ होने वाला है |
यह विडियो पहली बार १५ अगस्त १९८८ में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के लाल किले की प्राचीर से संबोधन के बाद दूरदर्शन पर प्रसारित किया गया था | और बहुत कम समय में इसका दर्जा और लोकप्रियता देश भर में राष्ट्रगान की तरह हो गई थी | इस गीत को पियूष पाण्डेय ने लिखा था और संगीत संयुक्त रूप से पंडित भीमसेन जोशी, अशोक पटकी और लुईस बैंक्स का था तथा इसका निर्माण लोक सेवा संचार परिषद् के साथ आरती गुप्ता और कैलाश सुंदरनाथ ने किया था |
और यह बोरियत उस वक्त अपने पीक पर होती थी जब ‘तमिल’ वाले भाग में डॉ. बालमुरलीकृष्ण समंदर के किनारे ‘इसैन्ताल नम इरुवरिन सुरमुम नमताकुम्’ गाते हुए प्रकट होते थे | इस भाग में जिन लोगों को यह गान सुनते हुए दिखाया जाता था, उनमें कमल हसन भी थे लेकिन मैं उन्हें काफी सालों बाद चीन्ह पाया | बिना मूंछों के जो थे |
‘साथिया तूने क्या किया’ वाली रेवती भी थीं, जिनको ‘नमन रहेगा निजी कारणों से | बाद में यह भी पता चला....पता क्या चला मैंने ही पता किया कि इसमें टेनिस प्लेयर रामनाथ कृष्णन भी थे, जिनके सुपुत्र रमेश कृष्णन को नब्बे के दशक में विम्बल्डन और डेविस कप के डबल्स में लिएंडर पेस के साथ खेलते देखा था |
इसके बाद चट्टानों के नृत्य वाला दृश्य आता था और डूबते-तैरते हाथी कौतूहल पैदा करते थे | कलकत्ता की मेट्रो से बड़ी नफासत से उतरते हुए अरुण लाल भी नजर आते थे | उस वक्त ब्लैक एंड व्हाइट टीवी पर मेट्रो को देखना छोटे शहर में रहते हुए बड़े शहरों की खासकर कलकत्ता की तरक्की के बारे में सुंदर धारणा निर्मित करता था | इसके बाद यह गाना पूर्वोत्तर की शांत वादियों में ले जाता जय, जहाँ संभवत: नागा समुदाय समूह में ठहरे हुए पानी की पृष्ठभूमि में नृत्य कर रहा होता है |
फिर इस गाने में वह स्टेज आती थी, जब लगता था कि अब बस इस बोझिल कार्यक्रम का अंत होने ही वाला है | सारे दृश्य गोवा की मस्ती भरी, समुद्रीय और आधुनिक जीवन शैली की तरफ शिफ्ट हो जाते थे | इसमें गोवा के एक मशहूर कार्टूनिस्ट और पेंटर मारिओ मिरांडा को भी दिखाया गया है, चित्रकारी करते हुए | पद्मभूषण से सम्मानित मिरांडा साहब के बारे में तब ज्ञात हुआ जब २०११ में उनका निधन हुआ |
तत्पश्चात मल्लिका साराभाई की गुजराती एंट्री होती है | वे उस वक्त डराती हुई लगती थीं | बड़ी-बड़ी आँखें, बड़ी बिंदी, खुले हुए बाल और तिस पर उनके बोल कि ‘मणे सूर जो तारो मारो, बने आपनो सूर निराणों” | पता नहीं इतना क्रोध में उन्होंने क्यों परफॉर्म किया उन्होंने ?
बहरहाल सीन में अब उस वक्त की हाई स्पीड रेल की एंट्री होती है लेकिन स्लो मोशन में और इस दृश्य के पार तनूजा होती हैं, जो मराठी में “माझ्या तुमच्या जुळता तारा, मधुर सुरांच्या बरसती धारा” गा रही होती हैं | वे मूल रूप से बंगाली हैं लेकिन उन्होंने इस गान में मराठी भाषा का प्रतिनिधित्व किया है | एक गैर मराठी ने महाराष्ट्र का प्रतिनिधित्व किया, मैं सोच सकता हूँ कि तब राज और उद्धव छोटे छोटे ही रहे होंगे |
यह यात्रा अपने अंतिम पड़ाव की ओर तब अग्रसर होती हुई प्रतीत होने लगती थी जब लता जी की आवाज में हिन्दी सिनेमा की नामचीन और तारिकाएँ वहीदा रहमान, हेमा मालिनी और शर्मीला टैगोर परदे पर नमूदार होतीं थीं | और अंत में स्वयं लता जी जब माइक के सामने इस गाने को समाप्त करतीं है तब उनके उनके चेहरे के भाव, ठहराव और आवाज के उतार-चढ़ाव बताते हैं कि जो लोग बीते सत्तर वर्षों से इस देश के लिए किसी तटबंध से खड़े रहे हैं उनमें लता जी भी एक हैं |
और फाइनली जिस एक वजह से ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ को कई दफा देखा जा सकता था, वह वजह थी – अमिताभ बच्चन-जितेन्द्र-मिथुन चक्रवर्ती की तिकड़ी | जो इस समूचे आयोजन में तमाम अजनबियों के बीच बेहद अपने से और ख़ास लगते थे, जिनको देखकर मुझे डबल खुशी होती थी | एक तो यह कि इन सितारों के दर्शन हो गए और दूसरा यह कि कुछ ही सेकंड में इस ‘सभा का समापन’ होने वाला है |
यह विडियो पहली बार १५ अगस्त १९८८ में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के लाल किले की प्राचीर से संबोधन के बाद दूरदर्शन पर प्रसारित किया गया था | और बहुत कम समय में इसका दर्जा और लोकप्रियता देश भर में राष्ट्रगान की तरह हो गई थी | इस गीत को पियूष पाण्डेय ने लिखा था और संगीत संयुक्त रूप से पंडित भीमसेन जोशी, अशोक पटकी और लुईस बैंक्स का था तथा इसका निर्माण लोक सेवा संचार परिषद् के साथ आरती गुप्ता और कैलाश सुंदरनाथ ने किया था |
No comments:
Post a Comment