Tuesday, 22 August 2017

दुर्घटना में घायल को ज्यादा हर्जाना मिलना चाहिए

'सात मरे और सतहत्तर घायल"

अगर यह एक खबर है तो इससे क्या पता चलता है ?
कि सात लोगों की जान जा चुकी है और सतहत्तर लोग मरहम पट्टी करवाकर अस्पताल से जल्द छुट्टी पा जाएंगे ।

जबकि सच्चाई इसके उलट यह होती है कि जो गुजर गया वह तो कुछ सेकंड और मिनटों के दर्द के बाद दुनिया से रुख़सत हो जाता है लेकिन जिनको घायल कहा जाता है उनकी अक्सर स्थिति मौत से भी बदतर होती है । यहां तक कि किसी हादसे में घायल होने वाले लोग कुछ घंटों और दिनों के अंतराल के बाद मृतकों की सूची में शामिल हो जाते हैं ।

और शेष में भी कुछ ऐसे होते हैं जो ऐसे हादसों में दर्द से तड़पते हैं, स्थायी और अर्ध अपंगता के चलते मौत सरीखा जीवन जीने को विवश हो जाते हैं ।

तिस पर भी सरकारों की एक फ्लैट पॉलिसी है; बतौर मुआवजा मृतक को तीन लाख, गम्भीर रूप से घायल को पचास हज़ार रुपये और मामूली घायल को पच्चीस हजार रुपये ।

जबकि होना तो यह चाहिए कि जिसको गम्भीर रूप से घायल कहा जाता है, उसे भी मृतक के समान मुआवज़ा मिलना चाहिए और मामूली घायलों को भी कम से कम पचास हज़ार रुपये । ताकि न केवल पीड़ितों के साथ अधिकतम न्याय हो सके बल्कि लोगों को भी उस दुर्घटना विशेष की गंभीरता का अंदाज़ा लग सके ।

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