Monday, 28 August 2017

राहुल बाबा गए नॉर्वे

राहुल गांधी एक अनिच्छुक नेता और कृत-संकल्पित मसखरे हैं | मेरे लिए जिज्ञासा केवल इतनी है कि वे दूसरी बात को किस डिग्री तक समझ पाए हैं, क्योंकि मैं इतना तो जानता हूँ कि वे जानते हैं कि वे क्या हैं और इसीलिए जब हाल ही में उनकी जीजी और जीजाजी ने अपने पुत्र के नाम में 'राजीव' एड किया तो इसमें सहमति और परामर्श राहुल गांधी का भी रहा होगा |

और इसीलिए वे कांग्रेस के दुर्दिनों को, सत्ता पक्ष और सोशल मीडिया के हमलों को किसी जहर की भांति गटक रहे हैं, क्योंकि वे जानते हैं एक न एक दिन, बेशक चार टर्म के बाद ही सही जब कांग्रेस का नम्बर आएगा तब तक वे अपने विरोधियों द्वारा उलीचा गया सारा जहर पी जायेंगे और सत्ता की चाबी अपने भांजे के हाथ में सौंप सकेंगे |

अन्यथा मुझे कोई अन्य कारण नजर नहीं आता कि आखिर क्या वजह है वे भारत की राजनीति और वर्तमान समय में मुद्दों की समझ से जूझ रहे हैं | मेरे देखते-देखते लालू जी के दोनों पुत्र भी सक्सेसफुली लॉन्च हो गए, जिसमें दूसरे वाले; पता नहीं वे बड़े हैं या छोटे - तेजप्रताप तो अदभुत हैं | कल पटना की रैली में उन्होंने बिना रुके तीन बार शंख फूंका |

जिन लोगों का शंख से कभी वास्ता नहीं पड़ा है उनको मैं बता दूं कि एक बार शंख बजाने में लगातार आधा घंटा दौड़ने के बराबर एनर्जी लगती हैं लेकिन उन्होंने तीन बार शंख फूंककर साबित कर दिया कि उनके भीतर स्टेमिना का लेवल क्या है ? बहरहाल सेट तो मुलायम सिंह जी के सुपुत्र अखिलेश जी भी हो गए हैं | अच्छा बोल लेते हैं, अब तो उनका चाचाओं से भी पिंड छूट गया है तो खूब खुश भी रहते हैं |

लेकिन राहुल जी क्या कर रहे हैं ? वे वही कर रहे हैं जो राजा-रजवाड़ों के समय महलों के भीतर रहने वाली रानियाँ करती थीं - गहने बनवाना और गहने तुड़वाना | अर्थात वे कागज पर लिखते हैं, कागज़ फाड़ते हैं जबकि मेरा आज भी मानना है कि अगर वे डॉ. साहब की दस साला सरकार के दौरान कोई भी गया गुजरा मंत्रालय लेकर, किसी पीआर एजेंसी के सहयोग से योजनाओं के पत्थर रखने और फीता काटने वाले काम भी कर डालते तो कांग्रेस और उन्हें इतने बुरे दिन न देखने पड़ते |

लेकिन जैसा कि मैंने कहा कि वे एक अनिच्छुक नेता हैं इसलिए नेतागीरी से परहेज करते हैं लेकिन उनके अंकिल लोग मानते नहीं हैं, उन्हें रोड शो, रैलियों और सभाओं में भेज देते हैं, द्विवेदी अंकिल उनके भाषण लिख देते हैं और कनिष्क भैया उन्हें अल-जजीरा चैनल से फीड बैक दे देते हैं तो उन्हें पता ही नहीं चलता है कि वे जहाँ गए थे वहां क्या 'कारनामा' करके आये हैं |

उनके मुखपत्र 'ऑफिस ऑफ़ आरजी' के अनुसार वे इन दिनों नॉर्वे राष्ट्र की आधिकारिक यात्रा पर हैं | वहां के विदेश मंत्रालय ने उन्हें पीली चिट्ठी भेजकर बुलाया है |  नॉर्वे देश तो मासूम है ही, जैसा कि मैं मेरे आदरणीय मित्र 'प्रवीण जी' के माध्यम से अवगत होता रहता हूँ लेकिन अब तो मैं वहां की सरकार की मासूमियत का कायल हो गया हूँ | मतलब नॉर्वे सरकार ने लगता है बुद्धत्व प्राप्त कर लिए है जहाँ उनके लिए 'नरेन्द्र' या 'राहुल' सिर्फ ह्यूमन बीइंग हैं | वे उसके लिए नफा और नुकसान नहीं हैं |

बहरहाल मैंने प्रवीण जी से भी कहा है कि उन्हें नॉर्वे में जैसे ही राहुल जी की सभाओं, संबोधनों, रोड शोज या किसी भी प्रकार की ज्ञात-अज्ञात गतिविधि की जानकारी प्राप्त हो मुझे कृपया तुरंत सूचित करें, भारत वर्ष में, मैं उनका 'शुभचिंतक' बेसब्री से उनकी खबरों का इन्तजार कर रहा हूँ |

Whatsapp overdose

*आज हर आदमी के पास एवरेज 500 से ज्यादा पोस्ट आ जाती है जो अधिकतर रिपीट होती है।  अधिकांश पोस्ट बिना देखे लोग डिलीट मार देते है।अब तो वाट्सप एलर्जी होने लगी है।*

कोई सुविधा मिली है तो इसका ये मतलब नहीं के उसका दुरूपयोग करे और उसका importance ही ख़त्म कर दें।

और ये सबके साथ हो रहा है,

*जब सब परेशान हैं तो आइये कुछ ऐसा करें :*

1  गुड़ मोर्निंग, सुप्रभात और फूल फुलवारी, की फ़ोटो भेजना बंद करे

2  कोई नई बात जो सबके हित की हो केवल उसे पोस्ट करें ताकि आपकी एक पहचान बने कि आप बेकार पोस्ट नही भेजते।

3.अंधविश्वास फैलाने वाले मेसिज बिलकुल ना भेजें।

4.अपने ग्रुप में केवल वही बात लिखें जो कि ग्रुप में आपके साथियों को आगे बढ़ने में मदद करें

5. जिस उद्देश्य के लिए ग्रुप बनाया है केवल उसकी बात करें लंबी कहानी डाल कर उसे बोरिंग ना बनाएँ।

*6.जन्मदिन सालगिरह या और कोई भी बधाई संदेश उस व्यक्ति के पर्सनल नंबर पर ही दे ग्रुप में न डाले.*

7. आशा है कि आप इस विषय पर विचार करेंगे

धन्यवाद

चीन ने मानी भारत की ताकत

चीन ने अपनी सेना हटाने की घोषणा करके तीसरे विश्व युद्ध और उसके बाद होने वाले अपने विघटन को बचा लिया। भारत की इस दृढ़ता का चीन के पास कोई जबाब नहीं निकल रहा था। जापान, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, जर्मनी, इज़राइल, वियतनाम, दक्षिणी कोरिया, मंगोलिया, बोत्सवाना, होन्ग कॉन्ग, ताइवान, इंडोनेशिया, मलेशिया और कई मेकांग व यूरोपीय देशों की भारत के प्रति समर्थन की प्रतिबद्धता ने चीन को भविष्य की आहट शायद दे दी थी। इसीलिये चीन ने अड़े रहने की बजाय थूक कर चाट लेने में ही अपनी भलाई समझी। इस घटना के बाद विश्व राजनीति में चीन की औकात 2 कौड़ी के कुत्ते जैसी हो गयी है और भारत एक महाशक्ति के तौर पर उभर कर आया है जिसने चीन को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। भारत की इस आक्रामक कूटनीति की सफलता के पीछे निश्चित तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विश्व मंच पर धमाकेदार कूटनीति एवं विदेशी दौरों का हाथ है।

झुक गया चीन

#एकदम_ताज़ी_असली_खबर
#डोकलम_पर
#केवल_मेरी_Id_पर😂

हाँ तो अफवाहों का बाजार गर्म हो चुका है , चेस्ट थम्पिंग हो चुकी है

इससे पहले की अफवाहें आपके दिमाग में बस जाएँ , एक असली और जिम्मेदार ID होने के नाते मेरा ये कर्तव्य है कि मैं असली बात आप तक पहुँचाऊँ ताकि आपको पूरा मैटर सही से समझ में आ जाए

भारत सरकार ने साफ़ कहा कि धीरे धीरे दोनों ही भारत और चीन की सेनाएँ डोकलम से हटेंगी

इसे अंग्रेजी में expeditious disengagement कहते हैं , सेनाएँ आज ही एक दिन में नही हटेंगी , इसमें उचित समय दोनों पक्षो द्वारा लिया जाएगा

पर ये प्रक्रिया आज से ही शुरू हो जायेगी ।।

भारत ने साफ़ कहा है कि दोनों पक्षो की सेनाएँ हटेंगी ।

अब चीन में इसको कैसे देखा जा रहा ?

चीन में दो प्रकार का मीडिया है एक थोड़ा सा चूतिया है एक महा चूतिया है ( ऐसा गूढ़ ज्ञान मैं बहुत पढ़ने के बाद बता रहा हूँ उनकी मीडिया )

जो थोड़ा सा चूतिया है वो मात्र 10% है वो कह रहा की

डोकलम विवाद दोनों सरकारों ने निबटा लिया है , भारत और चीन सेना हटाएंगे लेकिन चीन डोकलम में पेट्रोलिंग करता रहेगा , हम अपनी sovereignty ( संप्रभुता ) से कोई समझौता नही करेंगे ।।

अब इन गधों से पूछो पेट्रोलिंग करने की कौन सी लड़ाई है ?
हम तो सड़क रुकवाने गये थे वो तुम मान लिए बात खत्म ।। अब करो पेट्रोलिंग ससुर 😂😂

उतनी ऊँचाई पे कितना पेट्रोलिंग करोगे बे ? ठण्ड में तो वैसे भी सब बन्द रहता है 😂😂

और दूसरा महा चूतिया मीडिया है जो बहुसंख्यक है जो कह रहा की

भारत ने सेना हटाने पर काम शुरू किया , डोकलम में हमारी संप्रभुता बरक़रार रहेगी

गज़ब चूतिये हैं , अबे अगर हमको हटना ही होता तो 3 महीने से वहाँ खो खो खेल रहे थे हमारे जवान

अब इंटरनेशनल मीडिया की बात करें तो

उनका साफ़ रुख भारत सरकार के स्टेटमेंट पे है और चीनी सरकार ने भी उसी स्टेटमेंट को माना है ।।

हालाँकि साफ़ चायनीज सरकार ने भी नही कहा कि हम सीधे हट रहें भारत के साथ

चीन की फॉरेन मिनिस्ट्री की spokeswomen Hua Chunying ने कहा

China will continue to exercise sovereignty rights to protect territorial sovereignty in accordance with the rules of the historical boundary.. Chinese troops would continue to patrol the Doklam region .

China hopes India respects the historical boundary and works with China to protect peace along the border on the basis of mutual respect of each other's sovereignty..

इनका स्टेटमेंट पढ़ने से साफ़ पता चलता है , चीन भी पीछे हटा है फिलहाल ,

क्योंकि उनका कहना है हमारी सेना पेट्रोलिंग करती रहेगी

जबकि हमारी लड़ाई सड़क निर्माण को रुकवाने की थी , उनके एरिया में उनकी पेट्रोलिंग रोकने की नही

आप पीछे हट जाइये अपने एरिया में जी भर के पेट्रोलिंग करिये ,
हमें कोई दिक्कत नही होगी , पर विवादित जमीन पर सड़क बनाएँगे तो इसमें आप हार चुके हैं ,

राष्ट्र को इस सफलता पर बधाईं
मोदी डंटे रहे , तीन महीने
उनको भी बधाईं ।।।

आगे भी हम झुकेंगे नही , इसका साफ़ सन्देश है ।।

चीन की हेकड़ी निकाल दी मोदी ने

चीन बोला युद्ध कर के रहेंगे।

मोदी जी बोले नहीं बस 91 चीनी प्रोडक्ट्स पे डोपिंग ड्यूटी लगा दिया।

चीन बोला ये भारत को बहुत मँहगा पड़ेगा। हमारी सेनाएं पहाड़ से भी ज्यादा अडिंग हैं। हम भारत को बस 2 हप्ते का वक्त देते हैं। सेना हटा लो नहीं तो हम उखाड़ देंगे तंबू तुम्हारा।

उधर कुछ यूपी में अपने जीजा के दम पर बने मठा लोग जिनको योगी जी सीधा रिपोर्ट करते हैं,नेे घोषणा कर दी के भारत पर युद्ध थोप दिया गया है और ये युद्ध भारत को लड़ना पड़ेगा। पर मोदी चुप। मंत्रालय ने सभी चीनी मोबाइल कंपनियों को नोटिस भेजा के डेटा चोरी पर 2 हप्ते में जवाब पेस करो नहीं तो सरकार कार्यवाही करेगी।

चीन- हीहीही मोदी जी, अब क्या हम मजाक भी नहीं कर सकते? अब तो अप्पो वीवो के 400 चीनी वापस बुला लो यार। श्योमी तो मेड इन इंडिया लिखने लग गया। क्यों मेरे 59 हजार करोड़ के टर्न ओवर पे लात मार रहे हो। बिना युद्ध किये ही हमारे 2-4 लाख चिंको को मारने का प्रोग्राम सेट कर दिए आप तो। रहम करो मालिक ☺

मोदी जी -  जवाब जापान देगा। जापान -  हीहीही,
ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे,
चिंको की वाट लगा के ही छोड़ेंगे ☺☺

Sunday, 27 August 2017

भगवान अयप्पा : भगवान विष्णु के नौवें अवतार

#भगवान_अयप्पा

विष्णु जी का 9 वां अवतार

केरल में एक जगह है पेरियार टाइगर रिजर्व।

(पेरियार को तो आप जानते ही होंगे ? 500 दिलीप चु मंडल 200 अम्बेडकर 100 मायावती 100 केजरी को मिला कर एक पेरियार बनता है)

खैर ये बाद में केरल के पतनमथिट्टा जिले के पेरियार टाइगर रिजर्व की पहडियो में मंदिर है #सबरीमाला ये मंदिर है भगवान अयप्पा का। यहाँ कुम्भ मेले से ज्यादा तीर्थ यात्री जाते हैं हर साल यहाँ 10 करोड़ श्रद्धालु आते हैं।        

सबरीमाला मंदिर भी भारत के अमीर मंदिरों में आता है सोना ही सोना है इतना जितना अमेरिका के पास नहीं। ये मंदिर है विष्णु जी के 9 वां अवतार भगवान अयप्पा जी का।

गोरे आये तो उन होने गोतम बुद्ध को 9वां अवतार बना दिया। गोतम बुद्ध भी संत थे हिन्दू थे गौतम गोत्र से थे। मगर अवतार नहीं थे। यहाँ इन की चाल गलत पड़ गयी जिस को सुधारने के लिए इन होने इतिहास में तारीखे आगे पीछे कर दी आदि शंकराचार्य को 788 फिर बोद्धओ को हराना आदि कहानियां लिख दी टोटल कनफूजन पैदा कर दिया।

उस समय के गोरे लगे हुए थे हिन्दू धर्म को नीचा करने में जो आज भी बदस्तूर जारी है। कभी भगवा आतंकवाद तो कभी कोई हिन्दू गुरु रेप हत्या के कारण जेल में। 10 करोड़ श्रद्धालु प्रति वर्ष आते हैं तो इस को भी विवादों में फसाओ। वैसे केरल को बर्बाद करने का कारण हिन्दू संस्कृति की मजबूत जड़े है ।

#ayyappa_temple_controversy इस मंदिर को हमेशा विवादों में रखा गया अभी ताज़ा विवाद ये ही की महिलाओ को एंटरी क्यूँ नहीं, #मुल्लापेरियार_बांध जो पेरियार नदी पर है कभी काले इसाईंयो का हिन्दू यात्रियों पर पत्थर मरना। (नाम आएगा पत्थर मारने वाले धर्म का ) कभी बोला जाता है की ये तो गोतम बुद्ध हैं जिन का मंदिर बना दिया। ऐसे ही हजारो विवाद मगर हिन्दू श्रद्धालु की संख्या बढती गयी।

ऐसा ही एक विवाद बताया गया की ये शिव और विष्णुजी के पुत्र है। जब विष्णु जी ने मोहनी रूप धरा तो शिव जी मोहित हो गए और अय्यप्पा जी का जन्म हुआ। इतनी घटिया बात सुन कर लोग खुश होते हैं शिव और विष्णु जी के समलैंगिक सम्बन्ध और समलैंगिक संबंधों की संतान हैं। ये नाटक है अंग्रेजो का जिस में पूरा साथ देते हैं 3 श्री रवि। ये जहर पुराणों में भरा हुआ है । #homosexual_sexual_activities #Section_377 #निजता_का_अधिकार ।      

सब मिशनरी का खेल है।

भगवान अयप्पा के बारे में ज्यादा नहीं मिलता और जो मिलता है उस पर भरोसा नहीं होता। केरल से एक नाम जुडा है भगवान् परशुराम का। केरल को बसाने वाले भगवान् परशुराम ही हैं। भगवान् परशुराम का जिक्र रामायण में भी है और महाभारत में भी है ये भीष्म , द्रोणाचार्य व कर्ण के गुरु भी रहे हैं। सरस्वती नदी के सूखने पर ये केरल चले गए थे। इस दोरान भी बहुत कहानिया हैं जिन में से एक क्षत्रियों से पृथ्वी खाली करने वाली भी है ।    

तब के समय ही एक राजा हुआ करते थे पांडलम के राजशेखर । कुछ कहते हैं की भगवान अयप्पा उन को नदी किनारे मिले थे। मगर पैदा ही हुए होंगे तो राजा राजशेखर के पुत्र रूप में भगवान अयप्पा का जन्म हुआ ये जब पैदा हुए थे तो इन के गर्दन पर एक मणि लगी हुयी थी जिस वजह से इन का बदन सोने से चमक रहा था जिस वजह से इन का नाम मानिकांतन अय्यप्पन भी था और प्यार से हरी हरा बुलाया जाता था।

भगवान अयप्पा के गुरु थे परशुराम जी वेदों के ज्ञाता अस्त्र शस्त्र शास्त्र के ज्ञाता । #कलरीपायट्टु।

ये युद्ध कला दुनिया की सब से पुरानी युद्ध कला, (कमेन्ट बॉक्स में एक विडिओ लिंक है ) ये युद्ध कला परशुराम जी की ही देन है। परशुराम जी से ज्ञान और युद्ध कला सिखने के बाद भगवान अयप्पा ने बहुत छोटी उम्र में राजकार्य सम्हाल लिया था। बहुत कुछ है इन के बारे में ।

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मेरा मुद्दा ये ही की बहुत बड़ा खिलवाड़ किया गया है हिन्दू संस्कृति के साथ और चतला ही जा रहा है आज भी हिन्दू के दिमाग से खेला जा रहा है । ऐसा ही रहा तो वो दिन दूर नहीं जब भारत ईराक जैसा हो जायेगा फिर अफ्रीका जैसा।            

जय श्री राम

Saturday, 26 August 2017

जब ओशो बन्द थे जेल में

कल रात हरियाणा के पंचकोला की घटना को सुन व देख कर अचानक ओशो बहुत याद आये।
आपको शायद याद हो अमेरिका मे ओशो को बिना किसी गिरफ़्तारी वारंट के बिना किसी प्राथमिकी के अमरीकी पुलिस ने अचानक गिरफ़्तार कर लिया था और १२ दिनों तक एक निर्दोष और निहत्थे व्यक्ति को बेड़ियों, हथकड़ियाँ, और ज़ंजीरों से जकड़ कर विभिन्न जेलों मे घुमाते हुऐ उन्हे यातना के कई आयामों से गुज़ारा। विश्व मीडिया बताती है, उस समय पूरे विश्व मे ओशो के अनुयायियों की संख्या करोड़ों मे थी पर पूरे विश्व मे कही कोई अशांति या हिंसक प्रदर्शन नही हुए। ओशो जिस-जिस जेलों मे पहुँचते थे वहाँ सुबह-सुबह आदमियों की भीड़ नही वल्कि फूलो से लदे ट्रक पहुच जाते थे। अकलोहोमा जेल के जेलर ने अपनी आत्मकथा मे लिखा है मै सेवानिवृत्ति के क़रीब था मैने बहुत क़ैदियों को अपनी जेलें मे आते जाते देखा है पर जब ये शख्श(ओशो) मेरी जेल मे आया तो मैने महसूस कि और देखा कि मेरी जेल एक चर्च के रुप में बदल गई थी। पूरी जेल फूलो से भर गई थी कोई जगह ख़ाली नही थी। तब मै ख़ुद उस शख़्स के पास गया और अनायास ही मेरी आँखो से अश्रु बहने लगे, मै समझ नही पा रहा था और भरे गले से मैने उनसे पुछा कि, आप ही बताइए इन फूलो का मै क्या करु? ओशो में मेरी तरफ प्रेम पुर्ण दृष्टि डाली और बोले इन फूलो को पूरे शहर से स्कूलों और कालेजो मे भिजवा दिया जाय ये मेरी तरफ से उस विद्यार्थियों को भेंट है जो अभी शिक्षा ग्रहण कर रहे है।
जब ओशो को जेल से अदालत लाया जाता था तब उनके लाखों अनुयायी नगर वासियों को फूल भेंट करते थे और शांतिपूर्ण ढंग से प्रतीक्षारत रहते कि कब ओशो कोर्ट से बाहर आयेगे। जब ओशो कोर्ट से पुन: गुज़र जाते तो कोर्ट से लेकर जेल तक की सड़क फूलो से पटी होती थी। पूरे संसार से कही ऐसी कोई ख़बर नही थी कि ओशो किसी अनुयायी ने को उग्र आचरण किया या उग्र व्यक्तव्य दिया हो। जब भी कोई उनसे ओशो के सम्बध मे कुछ पुछता तो आँखो मे आँसुओ के साथ यही कहते- प्रकृति कुछ प्रयोग कर रही है, हाँ ये प्रयोग हमारे लिये थोडा असहनीय और कष्टप्रद जरुर है पर जैसी परमपिता की मर्ज़ी। हमारे सद्गुरू ने हमे ये सिखा दिया है कि कैसे परम स्वीकार के भाव मे जिया जाता है।
जिस जेल से ओशो को जाना होता, वहाँ का जेलर अपने परिवार के साथ उन्हे विदा करने के लिये उपस्थित होता और ओशो से आग्रह करता कि क्या मेरे परिवार के साथ आप अपनी एक फ़ोटो हमे भेंट करेगे? और ओशो मधुर मुस्कान से मुस्कराते हुए वही खड़े जाते और कहते कि आओ।
बहुत पहले जब ओशो भारत मे थे तब उन पर छूरा फैंका गया। ओशो ने तत्क्षण कहा, कोई अनुयायी उन सज्जन को कुछ भी न कहे और उन्हे छुए भी नही। वे कुछ कहना चाहते है, ये उनके कहने का ढंग है। उन्हे बिल्कुल छोड़ दिया जाए फिर अगले दिन ओशो ने प्रवचन के मध्य कहा- मै यह देख कर आनंदित हूँ कि तुम मे से किसी ने उन सज्जन को कोई चोट नही पहुँचाई , वल्कि प्रेम से उन्हे बाहर जाने दिया गया। यही मेरी शिक्षा है। कल कोई मेरी हत्या का भी प्रयास करे या जान भी लेले। लेकिन तुम उन्हे प्रेम ही देना ।
*गुरुदेव श्री जगदीश प्रसाद पाण्डेय जी कहते हैं सच्चे सद्गुरू की हमे शिक्षा और दीक्षा उनके अनुयायियों में परिलक्षित होती है। अनुयायी शब्द बडा समझने वाला है- अपने गुरू के बताये मार्ग पर ठीक ढंग से चलने वाले को अनुयायी कहते है । शांत, अनुशासन-शील, सर्व-स्वीकार्य और सुदृढ़ अनुयायी ही गुरु की सदाशयता को परिभाषित करते हैं।*
कल से मै चकित हूँ कि शांति के दूत बाबा रामरहीम ने क्या अद्भुत शिक्षा अपने भक्तों को दी है- पूरे शहर को आग मे झोंक दिया, ३० से ज्यादा लोग मारे गये और न बाबा और न ही उनके किसी प्रधान ने कोई ऐसा प्रयास किया जिससे यह अराजकता रुक सके और न ही कोई व्यक्तव्य दिया जिससे चरम पर पहुँची हिंसा और उग्रता ठहर सके।
बहुत आश्चर्य होता है!!!!!
साभार🦋🙏🏻
*जय - जगदीश*

अब खतना के खिलाफ उठी आवाज

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मुस्लिम महिला का PM को खुला खत, तीन तलाक के बाद महिला का खतना हो BAN

देश में चल रही तीन तलाक की बहस और सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बीच अब मुस्लिम महिलाएं खतने को लेकर भी आवाज उठा रही हैं. इसी कड़ी में मासूमा रानाल्वी ने पीएम के नाम एक खुला ख़त लिखकर इस कुप्रथा को रोकने की मांग की है.
मासूमा बोहरा समुदाय से है. अपने खत में वह लिखती हैं- स्वतंत्रता दिवस पर आपने मुस्लिम महिलाओं के दुखों और कष्टों पर बात की थी. ट्रिपल तलाक को आपने महिला विरोधी कहा था, सुनकर बहुत अच्छा लगा था. हम औरतों को तब तक पूरी आज़ादी नहीं मिल सकती जब तक हमारा बलात्कार होता रहेगा, हमें संस्कृति, परंपरा और धर्म के नाम पर प्रताड़ित किया जाता रहेगा.
स्वतंत्रता दिवस पर आपने मुस्लिम महिलाओं के दुखों और कष्टों पर बात की थी. ट्रिपल तलाक को आपने महिला विरोधी कहा था, सुनकर बहुत अच्छा लगा था.हम औरतों को तब तक पूरी आज़ादी नहीं मिल सकती जब तक हमारा बलात्कार होता रहेगा, हमें संस्कृति, परंपरा और धर्म के नाम पर प्रताड़ित किया जाता रहेगा.ट्रिपलतलाक अन्याय है, पर इस देश की औरतों की सिर्फ़ यही एक समस्या नहीं है. मैं आपको औरतों के साथ होने वाले खतने के बारे में बताना चाहती हूं, जो छोटी बच्चियों के साथ किया जाता है.
मासूमा लिखती हैं- ख़त के द्वारा आपका ध्यान इस भयानक प्रथा की तरफ़ खींचना चाहती हूं. बोहरा समुदाय में सालों से 'ख़तना' या 'ख़फ्ज़' प्रथा का पालन किया जा रहा है. बोहरा, शिया मुस्लिम हैं, जिनकी संख्या लगभग 2 मिलियन है और ये महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश और राजस्थान में बसे हैं.मैं बताती हूं कि मेरे समुदाय में आज भी छोटी बच्चियों के साथ क्या होता है. जैसे ही कोई बच्ची 7 साल की हो जाती है, उसकी मां या दादीमां उसे एक दाई या लोकल डॉक्टर के पास ले जाती हैं.
बच्ची को ये नहीं बताया जाता कि उसे कहां ले जाया जा रहा है या उसके साथ क्या होने वाला है. दाई या आया या वो डॉक्टर उसके प्राइवेट अंग को काट देते हैं. इस प्रथा का दर्द ताउम्र के लिए उस बच्ची के साथ रह जाता है. इस प्रथा का एकमात्र उद्देश्य है, बच्ची या महिला के यौन इच्छाओं को दबाना.
मासूमा के मुताबिक खतना महिलाओं और लड़कियों के मानवाधिकार का हनन है. महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव का ये सबसे बड़ा उदाहरण है. बच्चों के साथ ये अकसर होता है और ये उनके अधिकारों का भी हनन है. इस प्रथा से व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर पड़ता है.'सैंकड़ों सालों से इस प्रथा का शांति से पालन किया जा रहा है और बोहरा समुदाय के बाहर बहुत कम लोग ही इस प्रथा के बारे में जानते होंगे.
2015 में बोहरा समुदाय की कुछ महिलाओं ने एकजुट होकर 'WeSpeakOut On FGM' नाम से एक कैंपेन शुरू किया और यहां हमने आपस में अपनी दुख और कहानियां एक-दूसरे से कही. हमने ख़तना के खिलाफ़ एक जंग का ऐलान करने की ठानी.हमने अपने पादरी, सैदना मुफ़्फदल को इस प्रथा को रोकने के लिए कई ख़त लिखे, पर हमारी बात किसी ने नहीं सुनी.
ये प्रथा न सिर्फ़ आज भी चल रही है, बल्कि पादरी साहब ने एक पब्लिक प्रेस स्टेटमेंट में ये घोषणा भी कर दी कि 1400 साल से जो प्रथा चल रही है उसे किसी भी हालत में नहीं बदला जाएगा. 18 दिसंबर. 2014 में यूएन महासभा ने एक प्रस्ताव पारित किया जिसके तहत पूरी दुनिया में खतने को बैन करने की बात कही गई.पीएमजी, एक बार पहले भी आपने कहा था कि संविधान के अनुसार, मुस्लिम औरतों और उनके अधिकारों की रक्षा करना अनिवार्य है.
इसे बंद करने के समर्थन में हमें 9 हजार से ज़्यादा साइन मिल गए हैं. लेकिन अब तक सरकार की तरफ़ से हमें कोई जवाब नहीं मिला है. हमारे देश में सिर्फ़ बोहरा समुदाय में और केरल के कुछ समुदायों में ही इस प्रथा का पालन किया जाता है. हम 21वीं सदी में जी रहे हैं और कुछ चीज़ें बदलनी ही चाहिए. मैं सरकार से ये दरख़्वास्त करती हूं कि जल्द से जल्द इस कुप्रथा को ख़त्म करने पर काम शुरू किया जाए. इस प्रथा को बैन करके बोहरा बेटी बचाना बहुत ज़रूरी है.
https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=2376932689280492&id=1902922136681552
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फ़र्ज़ी बाबा और हिंदुत्व

बाबा राम रहीम वंचित वर्ग से हैं...ओर उनके सारे चेले चपाटे भी उसी वर्ग से हैं।
बाबा रामपाल
सन्त आशाराम
रामवृक्ष यादव
भी
या तो ओबीसी या वंचित वर्ग से हैं
और इनका सारा एजेंडा सनातन परम्पराओ से हटकर या उसके विरोध में हैं कुछेक अपवाद को छोड़कर...।
ये लोग न तो किसी शंकराचार्य को मानते हैं
न किसी देवी देवता को
ये किसी भी मत का प्रचार नही करते
बल्कि खुद को ही ईश्वर के तुल्य घोषित करने में लगे रहते हैं... इनके भक्तो के यहां चले जाइये...सबके घर पर देवी देवताओं की जगह इन्ही सन्तो की बड़ी बड़ी तस्वीरें लगी हुई मिलेगी...लॉकेट, साहित्य, भजन, कैसेट, सीडी में भी इन्ही तथाकथित गुरुओं का ही महिमामन्डन मिलेगा।
जब ये सन्त अपने वैभव के चरम पर होते है तब इनको #पाखण्डवाद_के_विरोध के रूप में पूरी दुनिया मे हिंदुत्व की कमियां बताकर इनका गुणगान किया जाता हैं,
पर जैसे ही इनका #पतन_होता हैं #प्रेस्टिट्यूड_मीडिया
इनको #तुरन्त_शंकराचार्य_या_मनु_महाराज के अवतार में पेश करने में लग जाता हैं
और हिन्दु धर्म की खिल्ली उड़ाई जाने लगती हैं।
मतलब "चित भी मेरी और पट भी मेरी"
इन संतो में से एक भी सवर्ण या ब्राह्मण नहीं हैं...और न ये किसी प्राचीन परम्परा या मत के आधार पर चल रहे किसी भी मठ या सम्प्रदाय का संचालन कर रहे थे और आज देश में जितने भी #डेरा_सच्चा_सौदा  की तरह नए मठ और सम्प्रदाय चल रहे हैं 90% जगह गैरसवर्ण ही इनको संचालित कर रहे हैं और समाज मे बड़े सन्त और समाज सुधारक के रूप में प्रतिष्ठित हो रहें है...और #दिलीप_चु_मण्डल जैसी मानसिकता के लोग तो इस सारे घटनाक्रम को गैर सवर्णो के खिलाफ सवर्णो साजिश ही करार न दे डालें  गैरसवर्णो को समाज में सन्तो के रूप में प्रतिष्ठित होने की इर्ष्या के कारण...उस #Dilip_c_mandal ने कोई पोस्ट डाली क्या इस बारे में...?????

संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के कारण कानूनी तौर पर इन मठों और सम्प्रदायों पर रोक लगाना सम्भव नहीं है...इनको मिलने वाली धनराशि भी पूरी तरह कर मुक्त होती हैं...बड़ी संख्या में समर्थकों का वोटबैंक होने के कारण राजनेता और सरकार भी इनपर हाथ डालने से डरते है पर जिस तरह से पहले रामवृक्ष यादव फिर रामपाल और अब रामरहीम के समर्थको ने उपद्रव मचाकर कानून और प्रशासन की धज्जियां उड़ाई है सरकार को भी इस तरह के मठ, सम्प्रदाय और डेरो पर अंकुश लगाने के लिये किसी कानून या आचार संहिता का निर्माण करना चाहिये...देश में चल रहे सभी सम्प्रदायो और पंथो को लेकर न कि इस बारे में भी तुष्टिकरणवाद के आधार पर नियमावली बना दी जाये...जैसे जब किसी रामरहिम जैसे संत को गिरफ्तार करना होता है तो उन्हे तुरंत कानूनी शिकंजे में ले लिया जाता है पर जब अन्य सम्प्रदाय के किसी धर्मगुरू की बारी आती है तो कानून और प्रशासन को सांप सूंघ जाता है...।
Dhiraj Bhargava

बाबा राम रहीम मामले की तुलना बाबा रामदेव मामले से कैसे

भारत माता की जय !
🙏🏻🇮🇳🚩
कुछ लोग बाबा राम रहीम पर टिप्पणी के बहाने बाबा रामदेव पर टिप्पणी कर रहे हैं कि ये सरकार बाबा राम रहीम की भीड़ को कण्ट्रोल नहीं कर पायी, जबकि कांग्रेस सरकार के राज में बाबा रामदेव को सलवार पहन के भागना पड़ा था।

अब मुझे ये तुलना समझ नहीं आती।
चलिए मान लिया आप बीजेपी के विरोधी हैं..
आपकी नजर में बाबा रामदेव ठग हैं.. तो क्या इसलिए आपकी नजर में आधी रात में सोये हुए लोगों पर, जो लोग पूरी तरह निहत्थे अहिंसक आंदोलन कर रहे थे, उनको आधी रात में लाठी से पीटना और उनपे आंसू गैस चलाना जायज था???? तो फिर दिल्ली पुलिस की ये बहादुरी, जामा मस्जिद के शाही इमाम को पकड़ने के मामले में कहां घुस गई थी ?

अगर यही बात है तो फिर आपकी नजर में जनरल डायर के द्वारा जो जलियांवाला बाग़ में किया गया था वो भी जायज होगा ??

है न !

दूसरी बात, कि लोग इसी बहाने आसाराम बापू और उनके समर्थकों पर भी टिप्पणी कर रहे हैं, तो उनकी जानकारी के लिए भी बता दें कि, बापू आसाराम के समर्थकों ने आज तक हिंसा नहीं की है, बल्कि जांच में पुलिस और न्यायालयों  का साथ ही दिया है । मीडिया चैनलों द्वारा आश्रमों की जमीनों को झूठा गैरकानूनी बता कर दुष्प्रचार किये जाने का सुप्रचार से मुकाबला किया है, ये आप आश्रमों में जाकर देख सकते हैं, जो असल में तो चल रहे हैं, पर मीडिया खबरों के अनुसार बंद हैं ।

और सबसे बड़ी बात, बापू आसाराम पर आज तक आरोप साबित नहीं हुआ है । पर ऐसे ही आरोप वाले तरुण तेजपाल जैसों को जमानत मिल चुकी है..

तीसरी बात, सभी साधु संतों को एक ही तराज़ू से तोलने वालों में अगर दम है, तो जामा मस्जिद के शाही इमाम पर, स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती के हत्यारों पर, कांची कामकोटी पीठ के शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती को झूठे इल्ज़ाम में फंसाने पर, मदर टेरेसा द्वारा किये जाने वाले धर्मांतरण पर, बलात्कार करने वाले ईसाई पादरियों पर, ननों की असल जिंदगी पर और मस्जिदों के मौलवियों पर, कर्नल पुरोहित के निर्दोष होने पर, साध्वी प्रज्ञा के निर्दोष होने पर, और भी न जाने ऐसे कितने केसों पर लिख कर दिखाएँ !!

हम किसी का भी समर्थन या विरोध नहीं कर रहे, हम तो केवल इतना कह रहे हैं कि, अरब व रोम के पैसे पर पालने वाला मीडिया, और भाई भतीजावाद में कंठ तक डूबे, कोलेजियम में सिफारिश से चुने गए अयोग्य जज, क्यों सबके बारे में बराबर राय नहीं रखते ? और तो और, मीडिया में दिखाई और लिखी जा रही हर खबर को सच मानने वाले मूर्ख हिंदुओं का तो कहना ही क्या ! और हाँ, हिंदुओं में सभी आते हैं, फिर चाहे वे स्वयं को हिन्दू माने या नहीं, क्योंकि अरब और रोम उनका भी नंबर लगायेंगें, ये पक्का है !

चौथी और सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि, हिंदुओं में, विभिन्न गुरुओं के चेलों में अब ये बात पक्की हो चली है कि अगला नंबर उनके ही गुरु का है, क्योंकि जज, मीडिया आदि केवल हिंदुओं के त्योहारों, कानूनों, गुरुओं आदि को ही टारगेट कर रहे हैं, और वो भी कुछ वर्ष पहले हुए बलात्कार आदि के मामले में, जिसकी पुष्टि इतने समय बाद मेडिकल जांच में नहीं हो सकती, जिसका कोई गवाह नहीं होता, लाई डिटेक्टर टेस्ट न्यायालयों में मान्य नहीं होता, और न ही ये किया जाता है, तो यही एक आरोप है जिसे साबित करने की कोई आवश्यकता नहीं है..

यहां बात किसी बाबा को निर्दोष साबित करने की नहीं है, बल्कि बात ये है, कि केवल बाबा ही क्यों ? जबकि खबरें तो पादरियों व मौलवियों की भी आती है, परंतु उन्हें राष्ट्रीय आपदा नहीं बनाते, मीडिया वाले !

बाकि, किसी के भी समर्थकों द्वारा हिंसा का हम विरोध करते हैं, और चाहते हैं कि न्यायालय व पुलिस अपना काम ठीक से करें, बिना किसी तुष्टिकरण के.. दोषी चाहे कोई भी हो, किसी भी पन्थ, मज़हब, रिलिजन जा हो, उस सज़ा मिले.. और सबसे बड़ी बात, जो केस न्यायालय में है, उस पर मीडिया अपना न्यायालय न लगाए, क्योंकि मीडिया की झूठी खबरों से ही किसी भी बाबा के भक्त बिगड़ते हैं, न्यायालय का निर्णय आने से पहले किसी भी केस पर मीडिया में चर्चा को कानून बना कर बंद किया जाए । और हाँ, जनता को भी मीडिया पर आंख बंद कर के विश्वास करना बंद करना होगा..
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भारत माता की जय !

कोर्ट का हथौडा भी धर्म देख के चलता है क्या

भारत माता की जय !
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#बात_में_दम_है

यह सारी दुनिया को पता है कि भारत के "माननीय न्यायालय" स्टे-ऑर्डर देने में तथा फैसले सुरक्षित रखने में "माहिर" होते हैं. बाबा रामरहीम के इस मामले में भी "माननीय" चाहते तो बड़े आराम से फैसला एक माह या पन्द्रह दिन सुरक्षित रख लेते... मुझे तो नहीं लगता कि भीड़ बार-बार एकत्रित हो सकती है... भीड़ को कभी न कभी तो थकना ही है.... "माननीय" कोई भी कानूनी तकनीकी पेंच फँसाकर मामले को तब तक टालते जाते, जब तक की बाबे के भक्तों की भीड़ बोर होकर कम होने लगती, या हरियाणा सरकार कोई पुख्ता व्यवस्था कर लेती...

माना कि खट्टर और कैप्टन सरकार भीड़ को एकत्रित होने से रोकने में नाकाम रही, इनका इंटेलीजेंस भी फेल रहा... लेकिन कोर्ट के "माननीय" किसी दूसरी दुनिया में तो नहीं रहते हैं, उन्हें भी आम लोगों की तरह, पता ही होगा कि लाखों की भीड़ मौजूद है, जो हिंसक हो सकती है.

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बाबे के बारे में अथवा उनकी राजनीति के बारे में कुछ कहना जल्दबाजी होगी... क्योंकि उनके लिए अभी भी उच्च न्यायालयों के रास्ते खुले हैं.. लेकिन जो हिंसा-आगज़नी-अव्यवस्था चल रही है, उस बारे में कई मित्रों की वाल पर यह सुझाव पढ़ा, उसमे दम लगता है कि अगर "माननीय" चाहते और थोड़ी सामाजिक जिम्मेदारी दिखाते हुए कुछ चतुराई दिखाते तो इस हिंसाचार रोका जा सकता था... क्योंकि "स्टे-ऑर्डर देना" और "फैसला सुरक्षित" रखने की तो आदत है इनको... वो बात और है कि जिसके आगे हिन्दू नाम जुड़ जाए उसको ये छोड़ते नहीं, और जिसके आगे मुस्लिम या ईसाई नाम जुड़ जाए, उसे ये छेड़ते नहीं.....

- सुरेश चिपलूनकर
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भारत माता की जय !

कब तक ब्राह्मण को कोसते रहोगे

प्रिय मित्रों। आज कुछ कटु सत्य की बात हम भी कर लें।
आज भारत में दलित और नीची जात ऊँची जात के नाम पर बहुत उपद्रव हो गया है।
किसी को भी यदि ताली पिटवानी हो तो हिन्दू धर्म और ब्राह्मण को गाली दे दो । अपनी आक्रामक और कथित प्रोग्रेसिव इमेज , कथित वैज्ञानिक सोच दिखानी हो , तो ब्राह्मण को गाली निकाल लो। हिन्दू धर्म और उसकी परम्पराओं एवं कर्मकाण्ड की खिल्ली उड़ाओ। देखो तुम्हें बहुत पोलटिकल मायलेज मिलेगा। टीरपी बढ़ जाएगी। न कोई विरोध होगा। पाँचों अंगुलियाँ घी में।
मैं मानता हूँ अतीत में ब्राह्मणों ने कुछ गलतियाँ की होंगी। लेकिन उसकी कीमत ब्राह्मणों ने अब चुका दी है। मैं समझता हूँ अब बहुत हो गया। अब पूरे विश्व की इस सर्वश्रेष्ठ,अद्भुत प्रतिभाशाली,त्यागपूर्ण,संतोषी,शांति पसन्द,सबसे वीर ,सबसे धीर,सबसे ज्यादा देशभक्त , सबसे ज्यादा धार्मिक समाज को व्यर्थ ही अपमानित करना बंद कर देना चाहिए। मित्रों यह इस घटिया लोकतंत्र का,या सीधे सीधे कहें वोट बैंक की राजनीति का ,(जिसमें सिर नहीं गिने जाते , हाथ गिने जाते हैं) परिणाम है कि इस देश की महान कौम को पीछे धकेल दिया गया है।
यह इस देश का भी दुर्भाग्य होगा कि वह अपने ही एक हिस्से को,अपने ही सबसे योग्य नागरिकों को वोट बैंक की गन्दी राजनीति के दुष्चक्र में पीछे धकेल रहा है।
आज ब्राह्मण कौम इस दुष्चक्र में फँस कर सहम सी गई है।
मेरे प्यारे मित्रो मेरी बात को थोड़ा ठहर कर सोचो। क्या यह एक सत्य नही है?भूल जाओ कि मैं एक ब्राह्मण हूँ इसलिए ऐसा कह रहा हूँ। नही,यह ब्राह्मण तो एक बार काल को भी रोक देने की क्षमता रखता है। हमें नही चाहिए आरक्षण। हमें तो एक सम्मान चाहिये बस। या कहूँ हमें सम्मान भी नही चाहिए। बस ब्राह्मणों का अपमान बंद कर दो। कहीं ऐसा न हो कि विप्र का अपमान सबको ले डूबे।
जय हिंद!

Friday, 25 August 2017

बाबा राम रहीम पर कार्यवाही बीजेपी के राज में हुई

BJP सरकार में सुनवाई हुई, BJP सरकार में सजा हुई, कांग्रेस ने 10 साल सिर्फ वोटबैंक देखा
साध्वी ने बाबा राम रहीम के खिलाफ रेप का आरोप 2002 में लगाया था, उस समय भी बाबा पावरफुल थे, साध्वी की शिकायत किसी ने नहीं सुनी, ना पुलिस, ना कानून और ना ही प्रशासन ने उसकी शिकायत सुनी. मजबूर होकर साध्वी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को चिट्ठी लिखी और अपना दुखड़ा कह सुनाया. साध्वी ने चिट्ठी में इतनी विचलित कर देने वाली बातें लिखी थीं कि अटल बिहारी का मन व्यथित हो गया और उन्होने तुरंत ही इस मामले की CBI जांच का आदेश दे दिया.
2004 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार चली गयी और उनके स्थान पर कांग्रेस की सरकार बनी और 10 साल तक केंद्र में सरकार रही. यही नहीं 10 साल तक हरियाणा में भी कांग्रेस की सरकार रही लेकिन उस समय बाबा राम रहीम पर हाथ लगाने की किसी में हिम्मत नहीं हुई.
अगर अटल बिहारी वाजपेयी 2004 में फिर से प्रधानमंत्री बन गए होते तो बहुत पहले बाबा राम रहीम को सजा मिल गयी होती और उनका इतना बड़ा साम्राज्य ना खड़ा हो पाता लेकिन कांग्रेस सरकार की उन पर हाथ डालने की हिम्मत नहीं हुई, उस समय ना हाई कोर्ट जागा और ना ही CBI जागी. कांग्रेस उस समय अपना वोट बैंक देख रही थी लेकिन बीजेपी ने वोट बैंक नहीं देखा.
अब केंद्र में मोदी सरकार है जो CBI जाग गयी है. हरियाणा में भी बीजेपी सरकार है तो हाई कोर्ट भी जाग गया है. तीन साल पहले CBI ने मामले की जांच शुरू की और आज तीन साल बाद मोदी सरकार की ताकत देखकर बाबा पर हाथ डाल दिया गया. बाबा राम रहीम ने जबरजस्त ताकत का प्रदर्शन किया लेकिन उनकी ताकत के आगे मोदी और खट्टर सरकार नहीं झुकी. आज उन्हें रेप मामले में दोषी साबित कर दिया गया और जेल भेज दिया गया.
कहने का मतलब ये है कि बीजेपी सरकार में ही साध्वी की शिकायत सुनी गयी और सीबीआई जांच के आदेश दिए गए, बीच में 10 साल तक कांग्रेस सरकार रही तो फाइल आगे नहीं बढ़ी लेकिन जैसे ही केंद्र और राज्य में बीजेपी सरकार आयी, CBI जाग गयी. हरियाणा हाई कोर्ट भी जाग गया, हाई कोर्ट ने आदेश दिया, सीबीआई ने आरोप पत्र दाखिल किया, आज सजा सुनाई गयी और बाबा राम रहीम सलाखों के पीछे पहुँच गए

अंध विश्वास अंध श्रद्धा और फर्जी गुरु

#अमेरिका में भी ऐसा हो चुका ###
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आत्मिक विकास और आध्यात्मिक लक्ष्य की प्राप्ति के लिए श्रद्धा जितनी आवश्यक और उपयोगी है उतनी ही घातक है- #अन्ध_श्रद्धा। अन्धश्रद्धा का अर्थ है बिना सोचे समझे, आँख मूँदकर किसी पर भी घनघोर विश्वास। इस तरह की अंधश्रद्धा किस प्रकार सर्वनाश के कगार पर ले पहुँचती है इसका उदाहरण पिछली शताब्दी में अमेरिका में 900 व्यक्तियों द्वारा सामूहिक आत्महत्या किये जाने के समय देखने में आया था। 21 नवम्बर 1978 को विश्व के लगभग सभी समाचार पत्रों में यह समाचार छपा था। 900 व्यक्तियों द्वारा सामूहिक रुप से आत्महत्या कर लिए जाने के पीछे अमेरिका के एक धर्मगुरु का हाथ था, जो स्वयं को अपने अनुयायियों का #आध्यात्मिक_पिता बताता था।

दक्षिण अमेरिका के एक प्रान्त गुयाना की राजधानी जार्ज टाउन से 238 किलोमीटर दूर घने जंगलों में करीब 11 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में एक नगर बसा हुआ था #जोंस_टाउन। यह कस्बा जिम जोंस के अनुयायियों द्वारा बसाया गया था और जिम जोन्स यहां आपने अनुयायियों के साथ  रहता था । अन्य व्यक्तियों का प्रवेश निषिद्ध था। 18 नवम्बर 1978 को शाम के समय इस कस्बे में बने एक उपासना घर में एकत्रित करीब नौ सौ व्यक्ति जिमजोंस के आदेश की प्रतीक्षा कर रहे थे। उन व्यक्तियों के कान में अपने गुरु की आवाज गूँजी-
"अब वह समय आ गया है जिसके लिए मैं तुम लोगों को सदैव तैयार रहने के लिए कहता रहा हूँ। हम सबको आज ही मरना है, इसी वक्त।"

इसके बाद उपस्थित सभी पुरुषों, स्त्रियों और बच्चों को विष मिला शरबत बाँटा गया। कुछ लोग ऐसे भी थे जो मरना नहीं चाहते थे। वे भागने की सोच रहे थे। इसके लिए उन्होंने अपने आस-पास देखा तो पाया कि चारो ओर बन्दूक तथा विष बुझे तीर कमान ताने पहरेदार तैनात हैं। कुछ लोगों ने इस पर आपत्ति की तो उनसे कहा गया कि बेहतर है स्वयं ही विषपान कर लिया जाये क्योंकि यहाँ से बचकर कोई नहीं जा सकता।

पहले छोटे-छोटे बच्चों को चम्मच से विष पिलाया गया। इसके बाद उपस्थित स्त्री-पुरुषों ने विषपान किया। जिन्होंने अपने गुरु की अवज्ञा करते हुए भागने की चेष्टा की वे पहरेदारों के तीरों और बन्दूक की गोलियों का निशाना बने। कुछ ही घण्टों में जोंस टाउन लाशों से पटा था। न केवल मनुष्यों की वरन् पशु-पक्षियों की लाशें भी वहाँ बिछ गयीं  अंत में #पीपुल्स_टेम्पल_के_गुरु_जिम_जोंस_ने_स्वयं_को_गोली_मार ली।

जिम जोंस पश्चिम में अन्धश्रद्धा का व्यापार चलाने वाले #अधर्म_गुरुओं में से एक था, जो पश्चिम की चकाचोंध कर देने वाली भौतिक समृद्धि से ऊबे लोगों की आध्यात्मिक जिज्ञासा का दोहन करने में लगे हुए थे। पिपासा इतनी तीव्र थी और अज्ञान इतना गहरा कि कौन सही तथा कौन गलत ... इसका निर्णय करने की किसी को फुरसत ही नहीं । जहाँ थोड़ा बहुत आकर्षण दिखाई दिया, वहीं प्रभावित हो गए और उन्हीं को अपना इष्ट, आराध्य मानकर उनकी उचित-अनुचित आज्ञाओं, आदेशों का आँख मूँदकर पालन करने लगे।

जिमजोंस ने पश्चिमी सभ्यता से ऊबे लोगों की इसी कमजोरी का लाभ उठाने के लिए सन् #1950में_पीपुल्स_टेम्पल नामक एक "सम्प्रदाय" चलाया...लोगों में अपना प्रभाव बढ़ाने तथा उन्हें अपनी ओर आकर्षित करने की हर संभव कोशिशें की। परिणामतः बड़ी संख्या में लोग जिमजोंस के अनुयायी बनने लगे। जब उसके शिष्यों की संख्या अत्यधिक हो गयी तो उसने सन् 1970 में अपना मुख्यालय #कैलीफोर्निया_से_सैनफ्राँसिस्को_स्थानाँतरित_कर_लिया। 1968 तक जिम का सितारा पूरी बुलन्दी पर था, लेकिन 1969 में उसके कुछ अनुयायियों ने पीपुल्स टेम्पल के रहस्य खोलना आरम्भ कर दिये। उनका कहना था कि पीपुल्स टेम्पल देखने भर को ही आदर्शों का प्रचार करने वाला संगठन है अन्यथा इस सम्प्रदाय में आतंक और नाटकीय यातनाओं का राज्य है। वहाँ जिम की इच्छा के बिना पत्ता भी नहीं हिल सकता। उसकी मर्जी के थोड़ा भी विरुद्ध जाने वालों को बुरी तरह पीटा जाता है तथा कठोर दण्ड दिया जाता हैं। जिमजोंस पर झूठा धार्मिक उपचार करने और भक्तों की सम्पत्ति हथियाने का आरोप भी लगाया गया।

अमेरिकी अधिकारियों से यह शिकायत की गई कि जिम अपने अनुयायिओं से बहुत ही पाशविक व्यवहार करता है। न केवल उनके अनुयायिओं को मारापीटा जाता है बल्कि उनसे दिनभर जमकर मेहनत कराई जाती है और नाम मात्र का भोजन दिया जाता है। कड़ी मेहनत करने वाले व्यक्ति वही लोग होते हैं जो अपनी सम्पत्ति पीपुल्स टेम्पल को सौंप चुके होते हैं। एक बार उसके चंगुल में फँसकर बच निकलना मुश्किल है। जिम ने अपने अनुयायिओं के बीच ही काफी गुप्तचर छोड़ रखे हैं और छोटी सी सेना भी बना रखी है ताकि बाहरी संकट का सामना किया जा सके।

इन खबरो के सामने आने पर अमरीका में जिम विरोधी हवा बहने लगी। #न्यू_वेस्ट_और_सैनफ्राँसिस्को_एग्जामिनर पत्रिकाओं ने पीपुल्स टेम्पल के बारे में सनसनी खोज विवरण प्रकाशित किये और अमरीकी प्रशासन से उसकी जाँच कराने की माँग की। यह माँग जोर पकड़ने लगी तो जिमजोंस अपने अनुयायिओं सहित गुयाना भाग गया।

स्वयं और सम्प्रदाय पर संकट के बादल मँडराते और पोल खुलती देखकर जिम अपने अनुयायिओं को समझाने लगा था कि कोई बाधा सिर पर आती देखकर हम लोग आत्महत्या कर लेंगें। उसने सामूहिक आत्महत्या की योजना को कई बार अपने अनुयायिओं के बीच स्पष्ट किया था। जिमजोंस से विद्रोह करने वाले उसके एक भूतपूर्व अनुयायी #डैवी_ब्लैकी ने अदालत को यह बताया कि "उसके गुरु ने कुछ खास अनुयायिओं को आश्रम के सभी बच्चों को मार डालने की जिम्मेदारी सोंप दी थी। उसके साथ यह भी बता दिया था कि बच्चों को मारने के बाद वे एक दूसरे की हत्या कर देंगें।"

जनता जैसे-जैसे पीपुल्स टेम्पल की असलियत जानने के बाद उसकी जाँच कराने की माँग करने लगी, उससे जिम का मनोबल टूटने लगा। उसने एक वक्तव्य दिया कि-"यदि सरकार या अन्य किसी बाहरी व्यक्ति ने आश्रम में घुसने का प्रयास किया तो वे सामूहिक आत्महत्या कर लेंगे।"

जनता की माँग और पीपुल्स टेंपल की गतिविधियों का रहस्य जानने के लिए #अमेरिकी_सीनेटर_लियोरियान की अध्यक्षता में एक बारह सदस्यीय दल गुयाना पहुँचा। 18 नवम्बर को यह दल अपने साथ कुछ असंतुष्ट जोंस पंथियों को लेकर मठ से बाहर निकल रहा था कि आश्रम के कुछ लोगों ने उन्हें चाकू दिखाकर रोका। बीच बचाव करने और समझाने, बुझाने के बाद वह लोग सुरक्षित बाहर निकल सके। वहाँ से निकल कर दल के लोग और प्रतिनिधि उस जंगल में बनी #पोर्ट_कैतुमा_हवाई_पट्टी पर खड़े विमान में सवार होने लगे तो पीपुल्स टेंपल के अनुयायिओं का एक दस्ता वहाँ आ पहुँचा और विमान पर गोलियों की बौछार करने लगा। इससे लियोरियान सहित चार जाँचकर्ता मारे गये।

यह आक्रमण जिम द्वारा अपने मठ की सुरक्षा के लिए गठित सेना द्वारा किया गया था। इस हत्या के परिणामों से जिमजोंस इतना भयाक्राँत हो उठा कि उसे अगले दिन अपने 900 शिष्यो सहित सामूहिक आत्म-हत्या अथवा हत्या के लिए बाध्य होना पड़ा। अमेरिकी प्रतिनिधि मण्डल पर हमले की खबर जब गुयाना की राजधानी पहुँची तो वहाँ के सैनिक जोंसटाउन पहुँचे। सैनिकों ने जोंसटाउन में प्रवेश किया तो उन्हें वहां लाशों का अम्बार मिला। नौ सौ लाशों के अलावा आश्रम में 17 शारगन, 15 रायफल, 7 रिवाल्वर एक फ्लोयर गन और भारी मात्रा में गोला बारुद का भण्डार भी मिला। इसके अलावा करीब 800 पासपोर्ट, कीमती सामान और नकद डालर भी बरामद हुए।

एक ही पंथ के अनुयायियों द्वारा इतनी बड़ी संख्या में एक साथ आत्म-हत्या करने की यह घटना विश्व इतिहास में अनोखी और अकेली घटना थी। जिम जोंस और उसके अनुयायियों द्वारा इतनी बड़ी संख्या में मौत को गले लगाने की घटना अन्धश्रद्धा का प्रतिफल था।

=×=×=

हरियाणा के पंचकूला में भी अभी कुछ ऐसे ही हालात बने हुऐ है। #डेरा_सच्चा_सौदा के #बाबा_राम_रहीम और उनके "अनुयायी"  ठीक वैसे ही मरने मारने और जान देने की बात कर रहें हैं जैसे जिमजोंस के आश्रम में 40 साल पहले की गयीं थी तो स्कूल समय मे #अखंड_ज्योति में पढ़ी ये घटना स्मरण मे लौट आई। पंजाब और हरियाणा में अभी इमरजेंसी जैसे हालात बने हुए हैं।

अंधविश्वास या अंधश्रद्धा व्यक्ति और समाज की दुर्बल मनोभूमि का परिचायक है और यह सिद्ध करता है कि उसमें स्वतः विचार कर निर्ष्कष करने की क्षमता का अभाव है। विश्वास श्रद्धा में भी किया जाता है पर फिर प्रश्न उठता है कि अंधश्रद्धा और श्रद्धा में कोई सीमा रेखा खींची जा सकती है ? #श्रद्धा_और_अंधश्रद्धा स्वरुपतः एक जैसी ही दिखाई पड़ने पर भी #दोनों_में_मूलभूत_अन्तर है।

श्रद्धा का अर्थ है आत्मविश्वास, ईश्वर पर विश्वास। प्रतीक कुछ भी चुन लिए जाएँ, परन्तु श्रद्धा अपने विवेक को ताक पर रखने की प्रेरणा नहीं देती। स्मरण रखा जाना चाहिए कि श्रद्धा के आधार पर प्रतीक चुन लिए जाएँ तो भी उसमें किसी भी प्रतीक पर पूर्णतः निर्भर नहीं हुआ जाता, क्योंकि कोई भी प्रतीक प्रतिमान का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता। वह आधार सहायता के लिए चुने जाते हैं न कि उनपर निर्भर होने के लिए।
जबकि
अंधश्रद्धा प्रतीकों को ही पकड़कर बैठ जाती है और उन्हीं पर निर्भर रहने लगती है।
हमें श्रद्धावान तो बनना चाहिए पर अंधश्रद्धा और अन्ध भक्ति से सदैव बचना चाहिए।

दोगले मीडिया

जो मीडिया आज पानी पी पी के गुरमीत राम रहीम को गरिया रही है , जो मीडिया आज सभी political पार्टीज को इसलिए गरिया रही है कि वो डेरे में जा के शीश नवाते हैं , वही मीडिया , वही सारे channels इसी बाबा से पैसे ले के उसकी चूतिया फिल्मों का promotion करते हैं , बाबा के चूतियापे भरे बेसुरे भोंडे Concert को पूरे 2 घंटे Live दिखाते हैं ।

आज ये नेताओं से पूछ रहे हैं कि एक बलात्कार के आरोपी के दरबार मे माथा टेकने क्यों गये ।
पहले तुम ये बताओ कि तुमने एक बलात्कार के आरोपी को Rock Star क्यों बना दिया अपने Channel पे ।

जो आदमी पंजाब में 36 seats और हरियाणा में 24 seats पे प्रभाव रखता हो उसके दरबार मे माथा क्यों नही टेकेगा नेता ??????
लोकतंत्र में .......... Heads Count ......उस Head में क्या भरा है ,दिमाग है गोबर ....... इस से फर्क नही पड़ता । लोकतंत्र में घास छीलने वाले के भोट की भी उतनी ही कीमत है जितनी एक DRDO के Scientist के भोट की ।

चुनाव में तो किसी के पास अगर 50 भोट हो तो नेता उसके पांव चूम लेता है , गुरमीत राम रहीम तो लाखों भोट control करता है ।
इतने भोट के लिए नेता पांव नही पिछवाड़ा चूम ले ..........
Public जब तक ऐसे बाबाओं को भगवान मानती रहेगी , नेता इन बाबाओं के दरबार मे हाजरी लगाते रहेंगे ।

लोकतंत्र की असली ताक़त Public है ।
नेता परेता , आबा बाबा और ईडिया मीडिया की कोई औकात नही ।
जन बल संख्या बल ही सर्वोच्च है लोकतंत्र में ।

अजित सिंह उदयन वाले

तीन तलाक पर रोक तो सिर्फ शुरुआत है

100 लीटर दूध में सिरके की एक बूंद डाल के देखो ।

माना कि 100 लीटर भोत जादे होता है पर उस एक बूंद सिरके को कम मत आंकिये ।

अब खीर नही बनेगी इतना तय है ।

आज तो सिर्फ शुरुआत हुई है । Instant TTT को असंवैधानिक ठहराया है ।
6 महीने में कानून बनाने को कहा है ।
कानून में जाने क्या पेल दें मोदी ।
मुझे तो इसकी परिणीति मैखिक तलाक की समाप्ति पे होती दीखे ........
ऐसे 3 बार बोलने से तलाक नही मिलेगा ।
तलाक़ लेना है तो Court जाइये और वैसे ही बरसों ** घिसिये जैसे बाकी लोग घिसते हैं ।

उसके बाद अगला नंबर 4 निकाह का लगने वाला है ।
मोदी Time Table बना के काम करते हैं , Planned way में ।
2019 से पहले ये TTT निमटा देंगे ।
उसके तुरंत बाद 4 निकाह का नंबर लग जायेगा ।
इस बीच अगले 6 महीने में 35A पे मी लार्ड का फैसला आ जायेगा ।
370 की जान तो 35A में है ।

TTT से 4N होती हुई ये लड़ाई Common Civil Code तक जाएगी ।
मेरा आकलन है कि मोदी 2024 CCC पे ही लड़ेंगे ।
2019 में संसद में मुस्लिम सांसदों की संख्या बहुत बहुत कम होने जा रही है ।
ये संख्या सिंगल digit में भी रह सकती है ।

आप आज के Verdict को कितना भी छोटा क्यों न मानें , आज भाई जान उतने ही मायूस हैं जितने 6 Dec 92 को थे ।
वो जानते हैं कि आगे बहुत तेज़ ढलान है ।
अजित सिंह उदयन वाले

भारतीय रेल और सुरेश प्रभु

#भारतीयरेल_1

सड़क किनारे फुटपाथ पे बने भोजनालय में लोगों को खाना खाते देखा है ?
ऐसे भोजनालय बड़े शहरों महानगरों में अक्सर फुटपाथ पे दिख जाते हैं ।
10 - 20 रु में भर पेट खाना खिला देते हैं आज भी ।
पानी जैसी दाल जिसे दाल नही बल्कि पीला पानी कहना चाहिए । साथ मे दो या 4 रोटी और भात । हो गया खाना ।
आपको इस सड़कछाप भोजनालय में बैठ के किसी बड़े रेस्त्रां वाली सर्विस की उम्मीद नही करनी चाहिए ।
आजकल ठीक ठाक ढाबे में भी दाल fry 80 रु की है और एक आदमी का भोजन का बिल औसतन 250 रु आता है ।
आपको 20 रु वाले भोजनालय से उस AC रेस्त्रां वाली सर्विस और साफ सफाई की उम्मीद नही करनी चाहिए ।
पर हमारी दशा उस ग्राहक वाली है जो एक बार किसी बहुत महंगे अच्छे रेस्त्रां में हो आया है , वहां का तौर तरीका देख आया है । और अब यहां फुटपाथ पे सड़क किनारे उड़ती धूल धक्कड़ और भिनभिनाती मक्खियों के बीच बैठा अंग्रेजी में order पेल रहा है कि भैया Menu लाओ .........

भारतीय रेल की दशा तो उस फुटपाथ वाले भोजनालय से भी बदतर है ।
क्या आप जानते हैं कि भारतीय रेल दुनिया का सबसे सस्ती परिवहन सेवा है ?
और इसे चला कौन रहा है ? दुनिया का सबसे निकम्मा , कामचोर , काहिल ,भ्रष्ट तंत्र ...... जिसमे राजनेता , अफसर , कर्मचारी  , ठेकेदार सब शामिल हैं ..........
और ये बेचारी रेल प्रतिदिन सवा दो करोड़ सूअरों को ढोती है , वो जिन्हें न उठने बैठने , खाने पीने , हगने , मूतने , थूकने , खखारने ........किसी चीज़ की तमीज नही ........

क्या आप जानते हैं कि आज से 3 साल पहले भारतीय रेल में 50 km यात्रा करने का टिकट 7 रु था जो आजकल बहुत बहुत ज़्यादा महंगा हो के 10 रु का हो गया है ।
वैसे अगर आप रोज़ यात्रा करते हैं तो MST बनवा के ये यात्रा आप 2 रु प्रतिदिन में भी कर सकते हैं ।

आपकी समस्या ये है कि आपको 2 रु में अमूल मक्खन की पूरी टिक्की के Fry की हुई दाल मखनी चाहिए ।
आपको ये पता होना चाहिए कि विकसित देशों में रेल यात्रा हवाई जहाज से ज़्यादा महंगी है ।
भारतीय रेल पिछले 70 साल से गड्ढे में गिरी हुई थी । लालू , रामविलास पासवान और ममता बनर्जी ने तो रेल का एकदम खून ही चूस लिया । आज़ाद भारत मे पहली बार कोई रेल मंत्री आया जिसने रेल का कायाकल्प करना शुरू किया है । आप पूरे देश मे रेल से घूम आइये , चप्पे चप्पे पे आपको काम होता दिखेगा । रेल में सबसे ज़्यादा मौतें मानव रहित रेल crossing पे होती थीं जिसपे किसी ने ध्यान न दिया ।
सुरेश प्रभु ने ये बीड़ा उठाया और 2019 से पहले एक भी Unmanned railway crossing नही रहेगी । युद्ध स्तर पे इनके नीचे Under pass बनाये जा रहे हैं ।
रेलवे स्टेशनों का विकास हो रहा है ।
जहां सिंगल लाइन है वहां दोहरीकरण और व्यस्त मार्गों पे DFC मने Dedicated Freight Corridor  बनाये जा रहे हैं । रेलमार्गों का विद्युतीकरण चल रहा है ।
स्टेशनों पे सुविधाएं बढ़ाई जा रही हैं ।
भारतीय रेल दुनिया का सबसे खस्ताहाल , सबसे बड़ा और सबसे व्यस्त रेल network है जो दुनिया मे सबसे ज़्यादा सूअरों की ढुलाई तकरीबन मुफ्त में करता है ।

सिर्फ एक आदमी से ही आस है ....... सुरेश प्रभु से ........ उसका भी आप इस्तीफा मांग लीजिये ।

अजित सिंह उदयन वाले

सुरक्षा के प्रति लापरवाही

#भारतीयरेल_2

भारतीय रेल में सुरक्षा व्यवस्था इतनी लचर क्यों है ?
अच्छा रेल छोड़िए , भारत मे सुरक्षा संरक्षा कहां चाक चौबंद चौकस है ?
हिंदुस्तानी Halmet लगा के काहें नही चलता ?
अच्छा वही हिंदुस्तानी जब चंडीगढ़ में Bike स्कूटर चलाता है तो halmet क्यों पहन लेता है ।
क्योंकि हम हिंदुस्तानी halmet अपनी safety सुरक्षा के लिए नही बल्कि पुलिस और चालान से बचने के लिए लगाते हैं ।
वही हाल Seat Belt का है ।
चंडीगढ़ में कोई आदमी Driving करते हुए फोन नही सुनता ।
चंडीगढ़ पुलिस पिछवाड़े में 2000 रु का चालान घुसेड़ देती है ।
किसी को नही बख्शती । विधायकों मंत्रियों नेताओं और DGP के लौंडे को भी नही बख्शती । रज़िया सुल्ताना विधायक और ADGP रिजवान ahmed के लड़के की सफारी तो CP उठा के ले गयी .........

दरअसल हम भारतीयों का  सुरक्षा को ले के " चलता है " , कुछ ना होता , कोई फर्क ना पड़ता ....... ये वाला attitude है हमारा सुरक्षा संरक्षा के प्रति ।
आपके साथ दुर्घटना रोज़ाना नही होती । जीवन मे एक बार होती है ।
सुरक्षा को नापने का पैमाना लाखों करोड़ों में होता है ।
किसी भी बड़े कारखाने में लिखा होता है कि इतने Million Man Hours में zero accident .......... मने अगर एक कारखाने में 1000 आदमी रोज़ाना 8 घंटे काम करें तो वहां एक दिन में 8000 man hours काम हुआ । अगर 3 शिफ्ट चलती हैं तो 24000 Man Hours ....... यानि कि एक साल में 87,60,000 Man Hours काम हुआ और एक भी दुर्घटना नही हुई ।
किसी भी Foreman की सबसे बड़ी अग्नि परीक्षा ये की उसकी मिल में सालों साल कोई दुर्घटना न हो ......... वहां बोर्ड पे लिखा हो ........ इतने करोड़ Man Hours और Zero Accident .......ऐसे में Foreman अपनी work force को समझाता है कि अगर आप सुरक्षा के प्रति सावधान नही रहेंगे तो Board पे हमारा रिकॉर्ड Zero से शुरू होगा .........
सुरक्षा नियमों का पालन दीवानगी से होना चाहिए ।
सुरक्षा नियम राष्ट्रीय चरित्र दर्शाते हैं ।
एक एक जान कीमती है । youtube पे तो हम देखते हैं कि पश्चिमी देशों में लोग कुत्ते बिल्ली पक्षी की जान बचाने को अपनी जान की बाजी लगा देते हैं ।
हमारे देश मे आदमी की जान की कीमत ही क्या है ??
आज कोई सरकार अगर सुरक्षा नियम कड़े कर दे तो उसके बहुत जल्दी अलोकप्रिय होने का खतरा पैदा हो जाता है ।
नितिन गडकरी ने प्रस्ताव दिया था कि Traffic Violations पे भारी जुर्माना और Camera और satellite से  निगरानी कर Violaters का चालान कर दिया जाए ।
मोदी बोले , अबे रहन दो , इत्ता tight मत करो ...... देस वासी नाराज हो जाएंगे और 2019 में लालू को ले आएंगे ।
इंग्लैंड , अमरीका और सिंगापुर में सड़क पे कूड़ा फेंक के दिखाओ न ?
भारत में क्यों नही हो सकती ये सख्ती ?
सूअर को नाली से निकालने की कोशिश की तो सूअर नाराज हो जाएंगे ।

सुरक्षा हो या स्वच्छता , या फिर Punctuality , इनके प्रति ढुलमुल रवैया हमारा राष्ट्रीय  चरित्र है । मूल चरित्र है । हम इन विषयों को हल्के में लेते हैं ।

ऐसे में अगर खतौली और औरैया होते रहे तो किमाश्चर्यम ?
राष्ट्रीय चरित्र को मोदी और प्रभु बदल देंगे ????
रातों रात ??
अजित सिंह उदयन वाले

बाबा राम रहीम,भक्त और उनपे अजित सिंह दद्दा के विचार

इस समय जब कि मैं यह पोस्ट लिख रहा हूँ, बाबा गुरमीत राम रहीम के चेले पंजाब हरयाणा समेत पाँच राज्यों में बवाल काट रहे हैं। जैसा कि मीडिया की भूमिका हमेशा रहती है, आज भी वैसी उतनी ही नकारात्मक है। इसे सरकार का बड़ा फेलियर बताया जा रहा है, कहा जा रहा है कि पंचकुला में दो लाख लोगों को क्यों जुटने दिया गया!
मुझे 1990 का अयोध्या का राम जन्मभूमि आंदोलन याद आता है, मुल्लायम जादों ने सात दिन पहले ही फैज़ाबाद संभाद को छावनी में तब्दील कर दिया था और इलाके में कर्फ्यू लगा दिया था ऊपर से यह बयान दे दिया कि परिंदा भी पर नही मार पायेगा। राम भक्तों ने इसे चैलेंज के रूप में लिया और पैदल ही अयोध्या की ओर चल पड़े। रेल, बस, सड़क सब बंद थीं यहाँ तक कि नदी में नाव भी नही चलने दी जा रही थी, इसके बावजूद लाखों रामभक्त पैदल ही खेतों की पखडंडी से हो के आयोध्या जा पहुँचे, हज़ारो लोगों ने तो सरयू नदी तैर कर पर की।जिस दिन कारसेवा थी, उस दिन अयोध्या की चप्पे चप्पे में राम भक्त मौजूद थे।
मुल्लायम की सारी पुलिस सारा प्रशासन और सारा सुरक्षा तंत्र देखता रहा और राम भक्तो को नही रोक पाए।
भक्त यदि ठान ले तो आप उसे नही रोक सकते। बल प्रयोग से हालात बिगड़ते ही हैं, इसलिए सरकारें जब तक कि पानी सर से ऊपर ना चढ़ जाये बल प्रयोग से बचते हैं।
जहां तक बात पंचकुला की है - पंचकुला, मोहाली और जीरकपुर दरअसल चंडीगढ़ की satellite cities हैं। चारों एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। पंचकुला में किसी को घुसने से रोकने के लिए आपको मोहाली, जीरकपुर और चंडीगढ़ में भी कर्फ्यू लगाना पड़ेगा।
जिकरपुर, मोहाली पंजाब में हैं, चंडीगढ़ एक यूनियन ट्ररीट्री है और पंचकूला हरयाणा में है, इसलिए पंचकुला को सील करना असंभव है और असली बात यह कि आप भक्तों को नही रोक सकते, वो पैदल ही चले आयेंगे और ऐसा ही हुआ भी।
यदि खट्टर आज से एक हफ्ता पहले सख्ती शुरू कर देते तो आज पंचकुला में दो लाख की जगह 5 लाख लोग होते।
सच्चाई यह है कि भारत मे लोकतंत्र नहीं बल्कि भीड़ तंत्र है और उन्मादी भीड़ से लोकतांत्रिक तरीके से नही निपटा जा सकता, उसके लिए आपको उत्तर कोरिया का किम जोंग या फिर चीन बनना पड़ेगा और कोई भी CM किम जोंग नही बनना चाहता।

मैं इस समय पंजाब में हूँ, इंटरनेट काल रात से बंद है, बिजली आज सुबह से गुल है, यह पोस्ट एक मित्र को फोन पर लिखवाई है और उन्होंने मेरी आईडी खोल के इसे लखनऊ से पोस्ट किया है।

Thursday, 24 August 2017

जानो ईसाइयत की असलियत

क्या कोई बता सकता है की अपने समय की हॉलीवुड की सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर फ़िल्म The Vinci code को भारत में क्यों बैन कर दिया गया????
क्या कोई बता सकता है की ओशो रजनीश ने ऐसा क्या कह दिया था जिससे उदारवादी कहे जाने वाले और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को ढिंढोरा पीटने वाला अमेरिका रातों-रात उनका दुश्मन हो गया था और उनको जेल में डालकर यातनायें दी गयी और जेल में उनको थैलियम नामक धीमा जहर दिया गया जिससे उनकी बाद में मृत्यु हो गयी?????

क्यों वैटिकन का पोप बेनेडिक्ट उनका दुश्मन हो गया और पोप ने उनको जेल में प्रताड़ित किया? दरअसल इस सब के पीछे ईसाइयत का वो बड़ा झूठ है जिसके खुलते ही पूरी ईसाईयत भरभरा के गिर जायेगी। और वो झूठ है प्रभु इसा मसीह के 13 वर्ष से 30 वर्ष के बीच के गायब 17 वर्षों का, आखिर क्यों इसा मसीह की कथित रचना बाइबिल में उनके जीवन के इन 17 वर्षों का कोई ब्यौरा नहीं है? ईसाई मान्यता के अनुसार सूली पर लटका कर मार दिए जाने के बाद इसा मसीह फिर जिन्दा हो गया था। तो अगर जिन्दा हो गए थे तो वो फिर कहाँ गए इसका भी कोई अता-पता बाइबिल में नहीं है। ओशो ने अपने प्रवचन में ईसा के इसी अज्ञात जीवनकाल के बारे में विस्तार से बताया था। जिसके बाद उनको ना सिर्फ अमेरिका से प्रताड़ित करके निकाला गया बल्कि पोप ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके उनको 21 अन्य ईसाई देशों में शरण देने से मना कर दिया गया।

असल में ईसाईयत/Christianity की ईसा से कोई लेना देना नहीं है। अविवाहित माँ की औलाद होने के कारण बालक ईसा समाज में अपमानित और प्रताडित करे गए जिसके कारण वे 13 वर्ष की उम्र में ही भारत आ गए थे। यहाँ उन्होंने हिन्दू, बौद्ध और जैन धर्म के प्रभाव में शिक्षा दीक्षा ली। एक गाल पर थप्पड़ मारने पर दूसरा गाल आगे करने का सिद्धान्त सिर्फ भारतीय धर्मो में ही है, ईसा के मूल धर्म यहूदी धर्म में तो आँख के बदले आँख और हाथ के बदले हाथ का सिद्धान्त था। भारत से धर्म और योग की शिक्षा दीक्षा लेकर ईसा प्रेम और भाईचारे के सन्देश के साथ वापिस जूडिया पहुँचे। इस बीच रास्ते में उनके प्रवचन सुनकर उनके अनुयायी भी बहुत हो चुके थे। इस बीच प्रभु ईसा के 2 निकटतम अनुयायी Peter और Christopher थे। इनमें Peter उनका सच्चा अनुयायी था जबकि Christopher धूर्त और लालची था।जब ईसा ने जूडिया पहुंचकर अधिसंख्य यहूदियों के बीच अपने अहिंसा और भाईचारे के सिद्धान्त दिए तो अधिकाधिक यहूदी लोग उनके अनुयायी बनने लगे। जिससे यहूदियों को अपने धर्म पर खतरा मंडराता हुआ नजर आया तो उन्होंने रोम के राजा Pontius Pilatus पर दबाव बनाकर उसको ईसा को सूली पर चढाने के लिए विवश किया गया। इसमें Christopher ने यहूदियों के साथ मिलकर ईसा को मरवाने का पूरा षड़यंत्र रचा। हालाँकि राजा Pontius को ईसा से कोई बैर नहीं था और वो मूर्तिपूजक Pagan धर्म जो ईसाईयत और यहूदी धर्म से पहले उस क्षेत्र में काफी प्रचलित था और हिन्दू धर्म से अत्यधिक समानता वाला धर्म है का अनुयायी था। राजा अगर ईसा को सूली पर न चढाता तो अधिसंख्य यहूदी उसके विरोधी हो जाते और सूली पर चढाने पर वो एक निर्दोष व्यक्ति की हत्या के दोष में ग्लानि अनुभव् करता तो उसने Peter और ईसा के कुछ अन्य विश्वस्त भक्तों के साथ मिलकर एक गुप्त योजना बनाई। अब पहले मैं आपको यहूदियों की सूली के बारे में बता दूँ। ये विश्व का सजा देने का सबसे क्रूरतम और जघन्यतम तरीका है। इसमें व्यक्ति के शरीर में अनेक कीले ठोंक दी जाती हैं जिनके कारण व्यक्ति धीरे धीरे मरता है। एक स्वस्थ व्यक्ति को सूली पर लटकाने के बाद मरने में 48 घंटे तक का समय लग जाता है और कुछ मामलो में तो 6 दिन तक भी लगे हैं। तो गुप्त योजना के अनुसार ईसा को सूली पर चढाने में जानबूझकर देरी की गयी और उनको शुक्रवार को दोपहर में सूली पर चढ़ाया गया। और शनिवार का दिन यहूदियों के लिए शब्बत का दिन होता हैं इस दिन वे कोई काम नहीं करते। शाम होते ही ईसा को सूली से उतारकर गुफा में रखा गया ताकि शब्बत के बाद उनको दोबारा सूली पर चढ़ाया जा सके। उनके शरीर को जिस गुफा में रखा गया था उसके पहरेदार भी Pagan ही रखे गए थे। रात को राजा के गुप्त आदेश के अनुसार पहरेदारों ने Peter और उसके सथियों को घायल ईसा को चोरी करके ले जाने दिया गया और बात फैलाई गयी की इसा का शरीर गायब हो गया और जब वो गायब हुआ तो पहरेदारों को अपने आप नींद आ गयी थी। इसके बाद कुछ लोगों ने पुनर्जन्म लिये हुए ईसा को भागते हुए भी देखा। असल में तब जीसस अपनी माँ Marry Magladin और अपने खास अनुयायियों के साथ भागकर वापिस भारत आ गए थे। इसके बाद जब ईसा के पुनर्जन्म और चमत्कारों के सच्चे झूठे किस्से जनता में लोकप्रिय होने लगे और यहदियों को अपने द्वारा उस चमत्कारी पुरुष/ देव पुरुष को सूली पर चढाने के ऊपर ग्लानि होने लगी और एक बड़े वर्ग का अपने यहूदी धर्म से मोह भंग होने लगा तो इस बढ़ते असंतोष को नियंत्रित करने का कार्य इसा के ही शिष्य Christopher को सौंपा गया क्योंकि Christopher ने ईसा के सब प्रवचन सुन रखे थे। तो यहूदी धर्म गुरुओं और christopher ने मिलकर यहूदी धर्म ग्रन्थ Old Testament और ईसा के प्रवचनों को मिलकर एक नए ग्रन्थ New Testament अर्थात Bible की रचना की और उसी के अधार पर एक ऐसे नए धर्म ईसाईयत अथवा Christianity की रचना करी गयी जो यहूदियों के नियंत्रण में था। इसका नामकरण भी ईसा की बजाये Christopher के नाम पर किया गया।

ईसा के इसके बाद के जीवन के ऊपर खुलासा जर्मन विद्वान् Holger Christen ने अपनी पुस्तक Jesus Lived In India में किया है। Christen ने अपनी पुस्तक में रुसी विद्वान Nicolai Notovich की भारत यात्रा का वर्णन करते हुए बताया है कि निकोलाई 1887 में भारत भ्रमण पर आये थे। जब वे जोजिला दर्र्रा पर घुमने गए तो वहां वो एक बोद्ध मोनास्ट्री में रुके, जहाँ पर उनको Issa नमक बोधिसत्तव संत के बारे में बताया गया। जब निकोलाई ने Issa की शिक्षाओं, जीवन और अन्य जानकारियों के बारे में सुना तो वे हैरान रह गए क्योंकि उनकी सब बातें जीसस/ईसा से मिलती थी। इसके बाद निकोलाई ने इस सम्बन्ध में और गहन शोध करने का निर्णय लिया और वो कश्मीर पहुंचे जहाँ जीसस की कब्र होने की बातें सामने आती रही थी। निकोलाई की शोध के अनुसार सूली पर से बचकर भागने के बाद जीसस Turkey, Persia(Iran) और पश्चिमी यूरोप, संभवतया इंग्लैंड से होते हुए 16 वर्ष में भारत पहुंचे। जहाँ पहुँचने के बाद उनकी माँ marry का निधन हो गया था। जीसस यहाँ अपने शिष्यों के साथ चरवाहे का जीवन व्यतीत करते हुए 112 वर्ष की उम्र तक जिए और फिर मृत्यु के पश्चात् उनको कश्मीर के पहलगाम में दफना दिया गया। पहलगाम का अर्थ ही गड़रियों का गाँव हैं। और ये अद्भुत संयोग ही है कि यहूदियों के महानतम पैगम्बर हजरत मूसा ने भी अपना जीवन त्यागने के लिए भारत को ही चुना था और उनकी कब्र भी पहलगाम में जीसस की कब्र के साथ ही ँरहै। संभवतया जीसस ने ये स्थान इसीलिए चुना होगा क्योंकि वे हजरत मूसा की कब्र के पास दफ़न होना चाहते थे। हालाँकि इन कब्रों पर मुस्लिम भी अपना दावा ठोंकते हैं और कश्मीर सरकार ने इन कब्रों को मुस्लिम कब्रें घोषित कर दिया है और किसी भी गैरमुस्लिम को वहां जाने की इजाजत अब नहीं है। लेकिन इन कब्रों की देखभाल पीढ़ियों दर पीढ़ियों से एक यहूदी परिवार ही करता आ रहा है। इन कब्रों के मुस्लिम कब्रें न होने के पुख्ता प्रमाण हैं। सभी मुस्लिम कब्रें मक्का और मदीना की तरफ सर करके बनायीं जाती हैं जबकि इन कब्रों के साथ ऐसा नहीं है। इन कब्रों पर हिब्रू भाषा में Moses और Joshua भी लिखा हुआ है जो कि हिब्रू भाषा में क्रमश मूसा और जीसस के नाम हैं और हिब्रू भाषा यहूदियों की भाषा थी। अगर ये मुस्लिम कब्र होती तो इन पर उर्दू या अरबी या फारसी भाषा में नाम लिखे होते।
सूली पर से भागने के बाद ईसा का प्रथम वर्णन तुर्की में मिलता है। पारसी विद्वान् F Muhammad ने अपनी पुस्तक Jami- Ut- Tuwarik में लिखा है कि Nisibi(Todays Nusaybin in Turky) के राजा ने जीसस को शाही आमंत्रण पर अपने राज्य में बुलाया था। इसके आलावा तुर्की और पर्शिया की प्राचीन कहानियों में Yuj Asaf नाम के एक संत का जिक्र मिलता है। जिसकी शिक्षाएं और जीवन की कहनियाँ ईसा से मिलती हैं। यहाँ आप सब को एक बात का ध्यान दिला दू की इस्लामिक नाम और देशों के नाम पढ़कर भ्रमित न हो क्योंकि ये बात इस्लाम के अस्तित्व में आने से लगभग 600 साल पहले की हैं। यहाँ आपको ये बताना भी महत्वपूर्ण है कि कुछ विद्वानों के अनुसार ईसाइयत से पहले Alexendria तक सनातन और बौध धर्म का प्रसार था। इसके आलावा कुछ प्रमाण ईसाई ग्रंथ Apocrypha से भी मिलते हैं। ये Apostles के लिखे हुए ग्रंथ हैं लेकिन चर्च ने इनको अधिकारिक तौर पर कभी स्वीकार नहीं किया और इन्हें सुने सुनाये मानता है। Apocryphal (Act of Thomas) के अनुसार सूली पर लटकाने के बाद कई बार जीसस sant Thomus से मिले भी और इस बात का वर्णन फतेहपुर सिकरी के पत्थर के शिलालेखो पर भी मिलता है। इनमे Agrapha शामिल है जिसमे जीसस की कही हुई बातें लिखी हैं जिनको जान बुझकर बाइबिल में जगह नहीं दी गयी और जो जीसस के जीवन के अज्ञातकाल के बारे में जानकारी देती हैं। इसके अलावा उनकी वे शिक्षाएं भी बाइबिल में शामिल नहीं की गयी जिनमे कर्म और पुनर्जन्म की बात की गयी है जो पूरी तरह पूर्व के धर्मो से ली गयी है और पश्चिम के लिए एकदम नयी चीज थी। लेखक Christen का कहना है की इस बात के 21 से भी ज्यादा प्रमाण हैं कि जीसस Issa नाम से कश्मीर में रहा और पर्शिया व तुर्की का मशहूर संत Yuj Asaf जीसस ही था।

जीसस का जिक्र कुर्द लोगों की प्राचीन कहानियों में भी है। Kristen हिन्दू धर्म ग्रंथ भविष्य पुराण का हवाला देते हुए कहता है कि जीसस कुषाण क्षेत्र पर 39 से 50 AD में राज करने वाले राजा शालिवाहन के दरबार में Issa Nath नाम से कुछ समय अतिथि बनकर रहा। इसके अलावा कल्हण की राजतरंगिणी में भी Issana नाम के एक संत का जिक्र है जो डल झील के किनारे रहा। इसके अलावा ऋषिकेश की एक गुफा में भी Issa Nath की तपस्या करने के प्रमाण हैं। जहाँ वो शैव उपासना पद्धति के नाथ संप्रदाय के साधुओं के साथ तपस्या करते थे। स्वामी रामतीर्थ जी और स्वामी रामदास जी को भी ऋषिकेश में तप करते हुए उनके दृष्टान्त होने का वर्णन है।

विवादित हॉलीवुड फ़िल्म The Vinci Code में भी यही दिखाया गया है कि ईसा एक साधारण मानव थे और उनके बच्चे भी थे। इसा को सूली पर टांगने के बाद यहूदियों ने ही उसे अपने फायदे के लिए भगवान बनाया। वास्तव में इसा का Christianity और Bible से कोई लेना देना नहीं था। आज भी वैटिकन पर Illuminati अर्थात यहूदियों का ही नियंत्रण है और उन्होंने इसा के जीवन की सच्चाई और उनकी असली शिक्षाओं कोको छुपा के रखा है।
वैटिकन की लाइब्रेरी में बहार के लोगों को इसी भय से प्रवेश नहीं करने दिया जाता। क्योंकि अगर ईसा की भारत से ली गयी शिक्षाओं, उनके भारत में बिताये गए समय और उनके बारे में बोले गए झूठ का अगर पर्दाफाश हो गया तो ये ईसाईयत का अंत होगा और Illuminati की ताकत एकदम कम हो जायेगी। भारत में धर्मान्तरण का कार्य कर रहे वैटिकन/Illuminati के एजेंट ईसाई मिशनरी भी इसी कारण से ईसाईयत के रहस्य से पर्दा उठाने वाली हर चीज का पुरजोर विरोध करते हैं। प्रभु जीसस जहाँ खुद हिन्दू धर्मं/भारतीय धर्मों को मानते थे, वहीँ उनके नाम पर वैटिकन के ये एजेंट भोले-भाले गरीब लोगों को वापिस उसी पैशाचिकता की तरफ लेकर जा रहे हैं जिन्होंने प्रभु Issa Nath को तड़पा तड़पाकर मारने का प्रयास किया था। जिस सनातन धर्म को प्रभु Issa ने इतने कष्ट सहकर खुद आत्मसात किया था उसी धर्म के भोले भाले गरीब लोगों को Issa का ही नाम लेकर वापिस उसी पैशाचिकता की तरफ ले जाया जा रहा है।.

बाबा बनने के फायदे

सोच रहा हूँ की बाबा बन जाऊँ
आजकल सरकार से ज्यादा पॉवरफुल तो ये बाबा लोग होते हैं ?
फिर तो मेरी भी हो जाएगी बल्ले बल्ले । ऐश भी होगा केश भी होगा और हुकम बजाने , सर झुकाने और इंडिया को जलाकर राख कर देने के लिए होगी ही 8-10 लाख गुलामों की भीड़ ।
बाबा बनके सबसे पहले इंडिया पर कब्ज़ा कर लूंगा फिर चेलों के साथ बांग्लादेश पर चढ़ाई कर दूंगा ? फिर उसके बाद पाकिस्तान जीत लूंगा ।
बांग्लादेश और पाकिस्तान जब अपने कब्जे में हो लेंगे तब बनाउँगा अखंड बाबालैंड ..... पर उससे पहले लोगों के दिमाग कब्जे में लेने होंगे और इंडिया के लोगों के दिमाग कब्जे में लेना कोई बड़ी बात नहीं है ।
एक बार बाबा बन तो जाइये , लोग खुद ही आ-आकर अपने दिमागों के कब्जे आपको सौंप कर जाएंगे ।
हिंदुस्थान में चूतियों की कमी थोड़े ही है । एक ढूंढो हज़ार मिलते हैं । हज़ार ढूंढोगे तो लाख मिलते हैं जो अपने बाबाओं के एक इशारे पर खुद के देश को फूंकने को तैयार बैठे हैं ।
साभार-- ashish pradhan

भारत बनाम चीन युद्ध का अंजाम

युद्ध के लिए तड़पती भारत की आत्मा और भुजाएँ

1962 की लड़ाई भारत नहीं हारा, हमारी फौज भी नहीं हारी, नेहरू की नोबेल-पुरस्कार-प्रेरित पंचशीली मूर्खता हारी और ड्रैगन की मक्कारी जीती। 2017 की लड़ाई का पहला  चरण--माइंड गेम--तो भारत बिना लड़े ही जीत गया है। दूसरे चरण की लड़ाई-- आयातित माल पर एंटी-डंपिंग ड्यूटी-- ड्रैगन के बूते की है ही नहीं , इसलिए वह बिलबिला रहा है क्योंकि 62 अरब डॉलर के गोल होने का ख़तरा है। तीसरे चरण की लड़ाई के लिए वह न मानसिक  रूप से तैयार है, न सैन्य रूप से और न ही कूटनीतिक रूप से। उधर भारत के जवान और किसान असली युद्ध के लिए तड़प रहे रहे हैं। युद्ध हुआ तो पाक के चार टुकड़े, PoK की समस्या खतम, भारत की जमीन वापस, तिब्बत को आज़ादी और ड्रैगन की धौंस भी फुर्र-फाख्ता। सबसे बड़ी बात , भारत का गौरव वापस और सेकुलर-वामी-जेहादी गिरोह का लोमड़ी-विलाप खतम।
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22 जुलाई की एक पोस्ट:
यह युद्ध भारत को आत्मविश्वास से भर देगा
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चीन के साथ युद्ध भारत को आत्मविश्वास से भर देगा।जयचंद-मीरज़ाफ़रों का तो सफाया ही समझिए। इस युद्ध के आसार कम हैं क्योंकि दूरगामी लाभ भारत के खाते में जाते हैं, फिर चीन और चीन के भारत में बसे एजेंट ऐसा क्यों चाहेंगे?
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बिना युद्ध के चीन को पीछे छोड़ने में भारत को अगर 30 साल लगते तो युद्ध के बाद 20 साल भी नहीं लगेंगे क्योंकि तब भारत का मन सही अर्थों में भयमुक्त और बौद्धिक रूप से स्वतंत्र होगा।
इसलिए सिर्फ फौज और राजनैतिक नेतृत्व ही नहीं बल्कि देश के जन-जन को चीन को दुश्मन नंबर एक मानते हुए तन-मन-धन से इस महायज्ञ की तैयारी में लग जाना चाहिए।
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गाँठ बाँध लीजिए कि चीन के साथ युद्ध एक सृजनात्मक ध्वंस साबित होगा जो नये भारतवर्ष का शंखनाद करेगा। अहिंसा को कायरता की हदतक महिमामंडित करनेवाले सदाबहार बुद्धिविलासी इस बात को समझने में असमर्थ हैं कि 100 करोड़ मोबाइल कनेक्शन पर सवार भारत दुनिया में अपनी हनक स्थापित करने के लिया कितना खलबला रहा है। इस काम के लिए पहला पड़ाव है एक अदद दुश्मन का चुनाव और भारत ने चीन को अपना दुश्मन नंबर एक घोषित कर रणनीतिक जीत का डंका पहले ही पीट दिया है।
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युद्ध के हथियार से ज्यादा जरूरी है युद्ध की जरुरत में अकुंठ विश्वास, युद्ध में कोई भी कसर न उठा रखने का संकल्प, कुछ लड़ाइयाँ हारने पर भी युद्ध को जीतने की जिद और जमीन पर लच भी गए तो राणा प्रताप की तरह कभी न हारनेवाला मन। आज के युवा भारत में वह सब कुछ है जो युद्ध के लिए जरूरी है और जो बूढ़े होते तानाशाही चीन में तेजी से तिरोहित होता जा रहा है।
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पाकिस्तान ने जब भी हमला किया उसके पास हिन्दुस्तान से बेहतर हथियार थे फिर भी मैदान में हारा क्योंकि उसके फौजी लीडरान ऐय्याश थे, कामचोर थे और पाकिस्तानी सम्मान से ज्यादा जेहाद-प्रेरित थे; जेहाद और इस्लाम वैश्विक अवधारणा होने के कारण युद्ध की स्थानीय और तात्कालिक जरुरत को कमतर करके आँकते हैं। इसके उलट भारत के युवा मन को चीन के साथ युद्ध की तात्कालिकता पर न सिर्फ विश्वास है बल्कि वह युद्ध के लिए उत्सर्ग करने को उद्धत है।
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क्यों उद्धत है भारत का युवा आज चीन से युद्ध के लिये? क्योंकि भारत के राष्ट्रीय नवजागरण को कुचला गया है भारतीय बुद्धिजीवियों द्वारा--पहले अंग्रेज़ों की मदद से और आजादी के बाद अंग्रेजियत की गुलाम सरकारों और नौकरशाही की मदद से। राणा प्रताप-शिवाजी-गुरुगोविंद सिंह-तिलक-अरविन्द-लाला लाजपतराय-भगतसिंह-आजाद-नेताजी-बादशाह खान की परम्परा को अपमानित किया गया है, पीढ़ी- दर -पीढ़ी को हीनभावना का शिकार बनाया गया है, भारत की आत्मा को घायल किया गया है। लेकिन इंटरनेट-मोबाइल-सोशल मीडिया पर सवार लोकतांत्रिक भारत के युवाओं ने इस भारतीयता-विरोधी साज़िश को अब पूरी तरह पहचान लिया है और इसे नेस्तनाबूद करने के लिए वे दिलोजान से लग गए हैं।
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इतिहास की बात करें तो वियतनाम, कोरिया और जापान ने चीन को नाकों चने चबा दिए हैं। अपना पड़ोसी नेपाल चीन को हरा चुका है। मंगोलिया तो रौंद चुका है।

#चीन #भारत #युद्ध #सृजनात्मक_ध्वंस #बौद्धिक_मुक्ति
#China #India #War #CreativeDestruction #IntellectualFreedom

Post credit by chandrkant p singh

जब जातिवाद से ऊपर उठके हिंदुओं ने तैमूरलंग को पराजित किया

तैमूर का पतन

हिन्दू समाज की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वे जातिवाद से ऊपर उठ कर सोच ही नहीं सकते। यही पिछले 1200 वर्षों से हो रही उनकी हार का मुख्य कारण है।  इतिहास में कुछ प्रेरणादायक घटनाएं मिलती है।  जब जातिवाद से ऊपर उठकर हिन्दू समाज ने एकजुट होकर अक्रान्तायों का न केवल सामना किया अपितु अपने प्राणों की बाजी लगाकर उन्हें यमलोक भेज दिया। तैमूर लंग के नाम से सभी भारतीय परिचित है। तैमूर के अत्याचारों से हमारे देश की भूमि रक्तरंजित हो गई। उसके अत्याचारों की कोई सीमा नहीं थी।

तैमूर लंग ने मार्च सन् 1398 ई० में भारत पर 92000 घुड़सवारों की सेना से तूफानी आक्रमण कर दिया। तैमूर के सार्वजनिक कत्लेआम, लूट खसोट और सर्वनाशी अत्याचारों की सूचना मिलने पर संवत् 1455 (सन् 1398 ई०) कार्तिक बदी 5 को देवपाल राजा (जिसका जन्म निरपड़ा गांव जि० मेरठ में एक जाट घराने में हुआ था) की अध्यक्षता में हरयाणा सर्वखाप पंचायत का अधिवेशन जि० मेरठ के गाँव टीकरी, निरपड़ा, दोगट और दाहा के मध्य जंगलों में हुआ।

सर्वसम्मति से निम्नलिखित प्रस्ताव पारित किये गये - (1) सब गांवों को खाली कर दो। (2) बूढे पुरुष-स्त्रियों तथा बालकों को सुरक्षित स्थान पर रखो। (3) प्रत्येक स्वस्थ व्यक्ति सर्वखाप पंचायत की सेना में भर्ती हो जाये। (4) युवतियाँ भी पुरुषों की भांति शस्त्र उठायें। (5) दिल्ली से हरद्वार की ओर बढ़ती हुई तैमूर की सेना का छापामार युद्ध शैली से मुकाबला किया जाये तथा उनके पानी में विष मिला दो। (6) 500 घुड़सवार युवक तैमूर की सेना की गतिविधियों को देखें और पता लगाकर पंचायती सेना को सूचना देते रहें।

पंचायती सेना - पंचायती झण्डे के नीचे 80,000 मल्ल योद्धा सैनिक और 40,000 युवा महिलायें शस्त्र लेकर एकत्र हो गये। इन वीरांगनाओं ने युद्ध के अतिरिक्त खाद्य सामग्री का प्रबन्ध भी सम्भाला। दिल्ली के सौ-सौ कोस चारों ओर के क्षेत्र के वीर योद्धा देश रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देने रणभूमि में आ गये। सारे क्षेत्र में युवा तथा युवतियां सशस्त्र हो गये। इस सेना को एकत्र करने में धर्मपालदेव जाट योद्धा जिसकी आयु 95 वर्ष की थी, ने बड़ा सहयोग दिया था। उसने घोड़े पर चढ़कर दिन रात दूर-दूर तक जाकर नर-नारियों को उत्साहित करके इस सेना को एकत्र किया। उसने तथा उसके भाई करणपाल ने इस सेना के लिए अन्न, धन तथा वस्त्र आदि का प्रबन्ध किया।

प्रधान सेनापति, उप-प्रधान सेनापति तथा सेनापतियों की नियुक्ति

सर्वखाप पंचायत के इस अधिवेशन में सर्वसम्मति से वीर योद्धा जोगराजसिंह गुर्जर को प्रधान सेनापति बनाया गया। यह खूबड़ परमार वंश का योद्धा था जो हरद्वार के पास एक गाँव कुंजा सुन्हटी का निवासी था। बाद में यह गाँव मुगलों ने उजाड़ दिया था। वीर जोगराजसिंह के वंशज उस गांव से भागकर लंढोरा (जिला सहारनपुर) में आकर आबाद हो गये जिन्होंने लंढोरा गुर्जर राज्य की स्थापना की। जोगराजसिंह बालब्रह्मचारी एवं विख्यात पहलवान था। उसका कद 7 फुट 9 इंच और वजन 8 मन था। उसकी दैनिक खुराक चार सेर अन्न, 5 सेर सब्जी-फल, एक सेर गऊ का घी और 20 सेर गऊ का दूध।

महिलाएं वीरांगनाओं की सेनापति चुनी गईं उनके नाम इस प्रकार हैं - (1) रामप्यारी गुर्जर युवति (2) हरदेई जाट युवति (3) देवीकौर राजपूत युवति (4) चन्द्रो ब्राह्मण युवति (5) रामदेई त्यागी युवति। इन सब ने देशरक्षा के लिए शत्रु से लड़कर प्राण देने की प्रतिज्ञा की।

उपप्रधान सेनापति - (1) धूला भंगी (बालमीकी) (2) हरबीर गुलिया जाट चुने गये। धूला भंगी जि० हिसार के हांसी गांव (हिसार के निकट) का निवासी था। यह महाबलवान्, निर्भय योद्धा, गोरीला (छापामार) युद्ध का महान् विजयी धाड़ी (बड़ा महान् डाकू) था जिसका वजन 53 धड़ी था। उपप्रधान सेनापति चुना जाने पर इसने भाषण दिया कि - “मैंने अपनी सारी आयु में अनेक धाड़े मारे हैं। आपके सम्मान देने से मेरा खूब उबल उठा है। मैं वीरों के सम्मुख प्रण करता हूं कि देश की रक्षा के लिए अपना खून बहा दूंगा तथा सर्वखाप के पवित्र झण्डे को नीचे नहीं होने दूंगा। मैंने अनेक युद्धों में भाग लिया है तथा इस युद्ध में अपने प्राणों का बलिदान दे दूंगा।” यह कहकर उसने अपनी जांघ से खून निकालकर प्रधान सेनापति के चरणों में उसने खून के छींटे दिये। उसने म्यान से बाहर अपनी तलवार निकालकर कहा “यह शत्रु का खून पीयेगी और म्यान में नहीं जायेगी।” इस वीर योद्धा धूला के भाषण से पंचायती सेना दल में जोश एवं साहस की लहर दौड़ गई और सबने जोर-जोर से मातृभूमि के नारे लगाये।

दूसरा उपप्रधान सेनापति हरबीरसिंह जाट था जिसका गोत्र गुलिया था। यह हरयाणा के जि० रोहतक गांव बादली का रहने वाला था। इसकी आयु 22 वर्ष की थी और इसका वजन 56 धड़ी (7 मन) था। यह निडर एवं शक्तिशाली वीर योद्धा था।

सेनापतियों का निर्वाचन - उनके नाम इस प्रकार हैं - (1) गजेसिंह जाट गठवाला (2) तुहीराम राजपूत (3) मेदा रवा (4) सरजू ब्राह्मण (5) उमरा तगा (त्यागी) (6) दुर्जनपाल अहीर।

जो उपसेनापति चुने गये - (1) कुन्दन जाट (2) धारी गडरिया जो धाड़ी था (3) भौन्दू सैनी (4) हुल्ला नाई (5) भाना जुलाहा (हरिजन) (6) अमनसिंह पुंडीर राजपुत्र (7) नत्थू पार्डर राजपुत्र (8) दुल्ला (धाड़ी) जाट जो हिसार, दादरी से मुलतान तक धाड़े मारता था। (9) मामचन्द गुर्जर (10) फलवा कहार।

सहायक सेनापति - भिन्न-भिन्न जातियों के 20 सहायक सेनापति चुने गये।

वीर कवि - प्रचण्ड विद्वान् चन्द्रदत्त भट्ट (भाट) को वीर कवि नियुक्त किया गया जिसने तैमूर के साथ युद्धों की घटनाओं का आंखों देखा इतिहास लिखा था।

प्रधान सेनापति जोगराजसिंह गुर्जर के ओजस्वी भाषण के कुछ अंश -

“वीरो! भगवान् कृष्ण ने गीता में अर्जुन को जो उपदेश दिया था उस पर अमल करो। हमारे लिए स्वर्ग (मोक्ष) का द्वार खुला है। ऋषि मुनि योग साधना से जो मोक्ष पद प्राप्त करते हैं, उसी पद को वीर योद्धा रणभूमि में बलिदान देकर प्राप्त कर लेता है। भारत माता की रक्षा हेतु तैयार हो जाओ। देश को बचाओ अथवा बलिदान हो जाओ, संसार तुम्हारा यशोगान करेगा। आपने मुझे नेता चुना है, प्राण रहते-रहते पग पीछे नहीं हटाऊंगा। पंचायत को प्रणाम करता हूँ तथा प्रतिज्ञा करता हूँ कि अन्तिम श्वास तक भारत भूमि की रक्षा करूंगा। हमारा देश तैमूर के आक्रमणों तथा अत्याचारों से तिलमिला उठा है। वीरो! उठो, अब देर मत करो। शत्रु सेना से युद्ध करके देश से बाहर निकाल दो।”

यह भाषण सुनकर वीरता की लहर दौड़ गई। 80,000 वीरों तथा 40,000 वीरांगनाओं ने अपनी तलवारों को चूमकर प्रण किया कि हे सेनापति! हम प्राण रहते-रहते आपकी आज्ञाओं का पालन करके देश रक्षा हेतु बलिदान हो जायेंगे।

मेरठ युद्ध - तैमूर ने अपनी बड़ी संख्यक एवं शक्तिशाली सेना, जिसके पास आधुनिक शस्त्र थे, के साथ दिल्ली से मेरठ की ओर कूच किया। इस क्षेत्र में तैमूरी सेना को पंचायती सेना ने दम नहीं लेने दिया। दिन भर युद्ध होते रहते थे। रात्रि को जहां तैमूरी सेना ठहरती थी वहीं पर पंचायती सेना धावा बोलकर उनको उखाड़ देती थी। वीर देवियां अपने सैनिकों को खाद्य सामग्री एवं युद्ध सामग्री बड़े उत्साह से स्थान-स्थान पर पहुंचाती थीं। शत्रु की रसद को ये वीरांगनाएं छापा मारकर लूटतीं थीं। आपसी मिलाप रखवाने तथा सूचना पहुंचाने के लिए 500 घुड़सवार अपने कर्त्तव्य का पालन करते थे। रसद न पहुंचने से तैमूरी सेना भूखी मरने लगी। उसके मार्ग में जो गांव आता उसी को नष्ट करती जाती थी। तंग आकर तैमूर हरद्वार की ओर बढ़ा।

हरद्वार युद्ध - मेरठ से आगे मुजफ्फरनगर तथा सहारनपुर तक पंचायती सेनाओं ने तैमूरी सेना से भयंकर युद्ध किए तथा इस क्षेत्र में तैमूरी सेना के पांव न जमने दिये। प्रधान एवं उपप्रधान और प्रत्येक सेनापति अपनी सेना का सुचारू रूप से संचालन करते रहे। हरद्वार से 5 कोस दक्षिण में तुगलुकपुर-पथरीगढ़ में तैमूरी सेना पहुंच गई। इस क्षेत्र में पंचायती सेना ने तैमूरी सेना के साथ तीन घमासान युद्ध किए।

उप-प्रधानसेनापति हरबीरसिंह गुलिया ने अपने पंचायती सेना के 25,000 वीर योद्धा सैनिकों के साथ तैमूर के घुड़सवारों के बड़े दल पर भयंकर धावा बोल दिया जहां पर तीरों* तथा भालों से घमासान युद्ध हुआ। इसी घुड़सवार सेना में तैमूर भी था। हरबीरसिंह गुलिया ने आगे बढ़कर शेर की तरह दहाड़ कर तैमूर की छाती में भाला मारा जिससे वह घोड़े से नीचे गिरने ही वाला था कि उसके एक सरदार खिज़र ने उसे सम्भालकर घोड़े से अलग कर लिया। (तैमूर इसी भाले के घाव से ही अपने देश समरकन्द में पहुंचकर मर गया)। वीर योद्धा हरबीरसिंह गुलिया पर शत्रु के 60 भाले तथा तलवारें एकदम टूट पड़ीं जिनकी मार से यह योद्धा अचेत होकर भूमि पर गिर पड़ा।

(1) उसी समय प्रधान सेनापति जोगराजसिंह गुर्जर ने अपने 22000 मल्ल योद्धाओं के साथ शत्रु की सेना पर धावा बोलकर उनके 5000 घुड़सवारों को काट डाला। जोगराजसिंह ने स्वयं अपने हाथों से अचेत हरबीरसिंह को उठाकर यथास्थान पहुंचाया। परन्तु कुछ घण्टे बाद यह वीर योद्धा वीरगति को प्राप्त हो गया। जोगराजसिंह को इस योद्धा की वीरगति से बड़ा धक्का लगा।
(2) हरद्वार के जंगलों में तैमूरी सेना के 2805 सैनिकों के रक्षादल पर भंगी कुल के उपप्रधान सेनापति धूला धाड़ी वीर योद्धा ने अपने 190 सैनिकों के साथ धावा बोल दिया। शत्रु के काफी सैनिकों को मारकर ये सभी 190 सैनिक एवं धूला धाड़ी अपने देश की रक्षा हेतु वीरगती को प्राप्त हो गये।

(3) तीसरे युद्ध में प्रधान सेनापति जोगराजसिंह ने अपने वीर योद्धाओं के साथ तैमूरी सेना पर भयंकर धावा करके उसे अम्बाला की ओर भागने पर मजबूर कर दिया। इस युद्ध में वीर योद्धा जोगराजसिंह को 45 घाव आये परन्तु वह वीर होश में रहा। पंचायती सेना के वीर सैनिकों ने तैमूर एवं उसके सैनिकों को हरद्वार के पवित्र गंगा घाट (हर की पौड़ी) तक नहीं जाने दिया। तैमूर हरद्वार से पहाड़ी क्षेत्र के रास्ते अम्बाला की ओर भागा। उस भागती हुई तैमूरी सेना का पंचायती वीर सैनिकों ने अम्बाला तक पीछा करके उसे अपने देश हरयाणा से बाहर खदेड़ दिया।

वीर सेनापति दुर्जनपाल अहीर मेरठ युद्ध में अपने 200 वीर सैनिकों के साथ दिल्ली दरवाज़े के निकट स्वर्ग लोक को प्राप्त हुये।

इन युद्धों में बीच-बीच में घायल होने एवं मरने वाले सेनापति बदलते रहे थे। कच्छवाहे गोत्र के एक वीर राजपूत ने उपप्रधान सेनापति का पद सम्भाला था। तंवर गोत्र के एक जाट योद्धा ने प्रधान सेनापति के पद को सम्भाला था। एक रवा तथा सैनी वीर ने सेनापति पद सम्भाले थे। इस युद्ध में केवल 5 सेनापति बचे थे तथा अन्य सब देशरक्षा के लिए वीरगति को प्राप्त हुये।

इन युद्धों में तैमूर के ढ़ाई लाख सैनिकों में से हमारे वीर योद्धाओं ने 1,60,000 को मौत के घाट उतार दिया था और तैमूर की आशाओं पर पानी फेर दिया।

हमारी पंचायती सेना के वीर एवं वीरांगनाएं 35,000, देश के लिये वीरगति को प्राप्त हुए थे।

प्रधान सेनापति की वीरगति - वीर योद्धा प्रधान सेनापति जोगराजसिंह गुर्जर युद्ध के पश्चात् ऋषिकेश के जंगल में स्वर्गवासी हुये थे।

(सन्दर्भ-जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-३७९-३८३ )

ध्यान दीजिये। एक सवर्ण सेना का उपसेनापति वाल्मीकि था। अहीर, गुर्जर से लेकर  36 बिरादरी उसके महत्वपूर्ण अंग थे। तैमूर को हराने वाली सेना को हराने वाली कौन थे? क्या वो जाट थे? क्या वो राजपूत थे? क्या वो अहीर थे? क्या वो गुर्जर थे? क्या वो बनिए थे? क्या वो भंगी या वाल्मीकि थे? क्या वो जातिवादी थे?

नहीं वो सबसे पहले देशभक्त थे। धर्मरक्षक थे। श्री राम और श्री कृष्ण की संतान थे? गौ, वेद , जनेऊ और यज्ञ के रक्षक थे।

आज भी हमारा देश उसी संकट में आ खड़ा हुआ है। आज भी विधर्मी हमारी जड़ों को काट रहे है। आज भी हमें फिर से जातिवाद से ऊपर उठ कर एकजुट होकर अपने धर्म, अपनी संस्कृति और अपनी मातृभूमि की रक्षा का व्रत लेना हैं। यह तभी सम्भव है जब हम अपनी संकीर्ण मानसिकता से ऊपर उठकर सोचना आरम्भ करेंगे। आप में से कौन कौन मेरे साथ है?


हिन्दुओ के कत्ले आम पर खामोश हिन्दू

मैं थूकता हूँ ऐसी "तथाकथितआजादी" पर – जो 50 लाख हिन्दुओं की हत्या के बदले मिली...
और दुःख की बात ये है कि – हिन्दू आज भी काटे भी जा रहा है...
क्या कश्मीर,क्या कैराना, क्या केरल और क्या आसाम बंगाल...

पता नही लोग कैसी आजादी की बात कर रहे है....

बंटवारे की "रक्तरंजित" हकीकत के उपर - ये "आजादी" के नाम का "पर्दा"  डाल कर - खुशियाँ  मनाना मेरे बस का नही..    
--------------
कैसी आज़ादी -??-
और किसके लिये आज़ादी -??-
आजाद कौन हुआ - हिन्दू या मुस्लमान -??-
हम हिन्दुओ को ऐसी आज़ादी से  क्या मिला -??-

जिन्होंने आज़ादी के आन्दोलन में कुछ भी योगदान नहीं दिया,
उन्हें पाकिस्तान,बांग्लादेश मिले और भारत में रहने वाले मुस्लिमो को हर प्रकार का आधिकार दिये गये।

भारत विभाजन का असली गुनाहगार कौन था :---
जवाहरलाल नेहरु ,मोहनदास करमचंद गाँधी की मोहम्मद अली जिन्ना -??-

उन 45 - 50 लाख निर्दोष हिन्दुओ का क़त्ल का जिम्मेदार कौन -??-
ये किसकी महत्वाकंच्चा की बलि चढ़ गये ये निर्दोष हिन्दू -??-

पाकिस्तान बनने की बाद भी 45 - 50 लाख हिन्दुओ का क़त्ल करके ये लोग कैसे रुक गये भारत में -??-

इस सबका जिम्मेदार जवाहरलाल नेहरु था,उसकी राज करने की महत्वाकंच्चा "हिन्दुओ" पर भारी पड़ी,
इसकी गलत नीतियों की वजह से 45 लाख हिन्दू मारे गये।
लाखो हिन्दू औरतो के साथ बलात्कार हुआ।
करोडो हिन्दुओ को अपना घर बार छोड़ना पड़ा।

इसके एकमात्र जिम्मेवार -"नेहरु गाँधी परिवार"- को हम सर आँखों पर बिठा कर रखा है।

असली आज़ादी हमें उस दिन मिलेगी ,जब इस “नेहरु गाँधी परिवार” को उनके अपने किये की सजा मिलेगी...
वन्देमातरम....
गिरधारी भार्गव 14.8.2017

भारतीय इतिहास को विकृत कर दिया गया

अजीब बात है - सिवाय एक आदमी {राजीव दीक्षित} के किसी ने इस तरफ ध्यान ही नही दिया,
सभी इतिहासकारों ने सिर्फ एकतरफा ही बाते किताबों में लिखी है,

क्या गुजरे हुए समय में - हमारा कोई जीवन दर्शन नही था,क्या हमारी कोई न्याय व्यवस्था नही थी,
क्या हमारा कोई धर्माचरण भी नही था, हमारी धरा पर क्या कभी कोई विद्द्वान पैदा ही नही हुए थे,
एक बहुत ही सोची समझी चाल के तहत हमारी सोच को ही बदल दिया गया –
इसी को हम गुलामी कह सकते है |

500 -700 वर्षों से हमें यही सिखाया पढाया जा रहा है :---

कि तुम बेकार हो, खराब हो, तुम जंगली हो, तुम तो हमेशा लड़ते रहते हो, तुम्हारे अन्दर सभ्यता नहीं है, तुम्हारी कोई संस्कृती नहीं है, तुम्हारा कोई दर्शन नहीं है, तुम्हारे पास कोई गौरवशाली इतिहास नहीं है, तुम्हारे पास कोई ज्ञान विज्ञान नहीं है आदि आदि।

मित्रों अंग्रेजों के एक एक अधिकारी भारत आते गए और भारत व भारत वासियों को कोसते गए। अंग्रजों से पहले ये गालियाँ हमें "फ्रांसीसी" देते थे, और फ्रांसीसियों से पहले ये गालियाँ हमें "पुर्तगालियों" ने दीं।

इसी क्रम में लॉर्ड मैकॉले का भी भारत में आगमन हुआ। किन्तु मैकॉले की नीति कुछ अलग थी।

उसका विचार था कि एक एक अंग्रेज़ अधिकारी भारत वासियों को कब तक कोसता रहेगा? कुछ ऐसी परमानेंट व्यवस्था करनी होगी कि हमेशा भारत वासी खुद को नीचा ही देखें और हीन भावना से ग्रसित रहें।

इसलिए उसने जो व्यवस्था दी उसका नाम रखा Education System. सारा सिस्टम उसने ऐसा रचा कि भारत वासियों को केवल वह सब कुछ पढ़ाया जाए जिससे वे हमेशा गुलाम ही रहें। और उन्हें अपने धर्म संस्कृती से घृणा हो जाए।
इस शिक्षा में हमें यहाँ तक पढ़ाया कि भारत वासी सदियों से गौमांस का भक्षण कर रहे हैं।
अब आप ही सोचे यदि भारत वासी सदियों से गाय का मांस खाते थे तो आज के हिन्दू ऐसा क्यों नहीं करते?

और इनके द्वारा दी गयी सबसे गंदी गाली यह है कि हम भारत वासी आर्य बाहर से आये थे। आर्यों ने भारत के मूल द्रविड़ों पर आक्रमण करके उन्हें दक्षिण तक खदेड़ दिया और सम्पूर्ण भारत पर अपना कब्ज़ा ज़मा लिया।
और हमारे देश के वामपंथी चिन्तक विदेशी धन से पोषित आज भी इसे सच साबित करने के प्रयास में लगे हैं।

इतिहास में हमें यही पढ़ाया गया कि कैसे एक राजा ने दूसरे राजा पर आक्रमण किया।

इतिहास में केवल राजा ही राजा हैं प्रजा नदारद है, हमारे ऋषि मुनि नदारद हैं। और राजाओं की भी बुराइयां ही हैं अच्छाइयां गायब हैं।

आप जरा सोचे कि अगर इतिहास में केवल युद्ध ही हुए तो भारत तो हज़ार साल पहले ही ख़त्म हो गया होता।

और राजा भी कौन कौन से गजनी, तुगलक, ऐबक, लोदी, तैमूर, बाबर, अकबर, सिकंदर जो कि भारतीय थे ही नहीं।

इतिहास से सारे भारतीय हिन्दू -- राजा विक्रमादित्य, चन्द्रगुप्त, महाराणा प्रताप, पृथ्वीराज चौहान गायब हैं।

इनका ज़िक्र तो इनके आक्रान्ता के सम्बन्ध में आता है।
जैसे सिकंदर की कहानी में चन्द्रगुप्त का नाम है।
चन्द्रगुप्त का कोई इतिहास नहीं पढ़ाया गया।

और यह सब आज तक हमारे पाठ्यक्रमों में है।

साभार - मित्रगण – आभारी - गिरधारी भार्गव
 August 16, 2014  - से -19.8.2017

फंस गया चीन

डोकलाम विवाद के कारण मुसीबत में चीनी राष्ट्रपति चिनफिंग, उठ रहे सवाल !

इसमें कोई शक नहीं कि चीन एक महाशक्ति है, लेकिन उनकी हरकतें गली के किसी गुंडे जैसी हैं। लेकिन डोकलाम विवाद राष्ट्रपति चिनफिंग के लिए गले की हड्डी जैसा बन गया है।

कलाम विवाद को करीब तीन महीने होने जा रहे हैं। इतने समय से दोनों देशों की सेनाएं यहां आमने-सामने खड़ी हैं। भारत जहां एक ओर इस विवाद का कूटनीतिक हल निकालने की कोशिशों में जुटा है, वहीं चीन की नापाक हरकतों को देखते हुए सीमा पर भी चौकसी बरते हुए है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह को इस विवाद के जल्द सुलझने की उम्मीद है। भारत ने इस विवाद को सुलझाने का जो रास्ता सुझाया था, चीन उसे मानने को तैयार नहीं है। चीन की तरफ से रोज नई-नई तरह की धमकियां दी जा रही हैं।  इन धमकियों के पीछे उसकी बौखलाहट साफ झलकती है।

चिनफिंग के लिए मुसीबत बना डोकलाम

डोकलाम विवाद चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग के लिए एक तरह से गले की हड्डी बन चुका है। अपनी अकड़ के चलते चीन यहां से पीछे हटने को तैयार है और ऐसा प्रतीत होता है कि वह युद्ध में भी नहीं जाता चाहता। क्योंकि युद्ध हुआ तो इसका नुकसान चीन को भी उठाना पड़ेगा। इस मामले पर राष्ट्रपति चिनफिंग कई तरफ से घिर चुके हैं। इसे सुलझाने में नाकामी उनकी घरेलू और अंतरराष्ट्रीय साख के लिए खातक साबित हो रही है। अपनी ही पार्टी में उन पर लोगों का भरोसा कम होता दिख रहा है। इसी साल चीन में कई अहम बैठकें होने जा रही हैं। ऐसे में चिनफिंग पर दबाव होगा कि वह समय रहते डोकलाम विवाद का स्थायी हल खोज निकालें, जिससे पार्टी में उनका कद बना रहे।

पार्टी में गिर रहा चिनफिंग का कद

इस साल के अंत तक चीन की कम्युनिस्ट पार्टी अपनी 19वीं कांग्रेस का आयोजन करने जा रही है। राष्ट्रपति शी चिनफिंग की कोशिश होगी कि वे इसमें अपनी जगह पक्की करें। हालांकि उम्र के आधार पर चिनफिंग और चीनी प्रधानमंत्री ली केकियांग को ही पोलित ब्यूरो में जगह मिलेगी। आशंकाएं हैं कि चिनफिंग पोलित ब्यूरो की स्टैंडिंग कमेटी में अपने खास लोगों को जगह दिलाने की योजना बना रहे हैं। लेकिन, डोकलाम मुद्दे के चलते उन्हें इस बैठक में विरोध का सामना भी करना पड़ सकता है।

वियतनाम की प्रेरणा स्त्रोत थे महाराणा प्रताप

वियतनाम विश्व का एक छोटा सा देश है जिसने..... अमेरिका जैसे बड़े बलशाली देश को झुका दिया।

लगभग बीस वर्षों तक
चले युद्ध में अमेरिका पराजित हुआ।थ अमेरिका पर विजय के बाद वियतनाम के राष्ट्राध्यक्ष से एक पत्रकार ने एक सवाल पूछा.....

जाहिर सी बात है कि सवाल यही होगा कि आप युद्ध कैसे जीते या अमेरिका को कैसे झुका दिया ??

पर उस प्रश्न का दिए गए उत्तर को सुनकर आप हैरान रह जायेंगे और आपका सीना भी गर्व से भर जायेगा।
दिया गया उत्तर पढ़िये।

सभी देशों में सबसे शक्ति शाली देश अमेरिका को हराने के लिए मैंने एक महान व् श्रेष्ठ भारतीय राजा का चरित्र पढ़ा।
और उस जीवनी से मिली प्रेरणा व युद्धनीति का प्रयोग कर हमने सरलता से विजय प्राप्त की।

आगे पत्रकार ने पूछा...
"कौन थे वो महान राजा ?"

मित्रों जब मैंने पढ़ा तब से जैसे मेरा सीना गर्व से चौड़ा हो गया आपका भी सीना गर्व से भर जायेगा।

वियतनाम के राष्ट्राध्यक्ष ने
खड़े होकर जवाब दिया...
"वो थे भारत के राजस्थान में मेवाड़ के महाराजा महाराणा प्रताप सिंह !!"

महाराणा प्रताप का नाम
लेते समय उनकी आँखों में एक वीरता भरी चमक थी। आगे उन्होंने कहा...

"अगर ऐसे राजा ने हमारे देश में जन्म लिया होता तो हमने सारे विश्व पर राज किया होता।"

कुछ वर्षों के बाद उस राष्ट्राध्यक्ष की मृत्यु हुई तो जानिए उसने अपनी समाधि पर क्या लिखवाया...

 "यह महाराणा प्रताप के एक शिष्य की समाधि है !!"

कालांतर में वियतनाम के
विदेशमंत्री भारत के दौरे पर आए थे। पूर्व नियोजित कार्य क्रमानुसार उन्हें पहले लाल किला व बाद में गांधीजी की समाधि दिखलाई गई।

 ये सब दिखलाते हुए उन्होंने पूछा " मेवाड़ के महाराजा महाराणा प्रताप की समाधि कहाँ है ?"

 तब भारत सरकार के अधिकारी  चकित रह गए,  और उनहोंने वहाँ उदयपुर
का उल्लेख किया। वियतनाम के विदेशमंत्री उदयपुर गये, वहाँ उनहोंने महाराणा प्रताप की समाधि के दर्शन किये।

समाधी के दर्शन करने के बाद उन्होंने समाधि के पास की मिट्टी उठाई और उसे अपने बैग में भर लिया इस पर पत्रकार ने मिट्टी रखने का कारण पूछा !!

उन विदेशमंत्री महोदय ने कहा "ये मिट्टी शूरवीरों की है।
इस मिट्टी में एक महान् राजा ने जन्म लिया ये मिट्टी मैं अपने देश की मिट्टी में
मिला दूंगा ..."

"ताकि मेरे देश में भी ऐसे ही वीर पैदा हो। मेरा यह राजा केवल भारत का गर्व न होकर सम्पूर्ण विश्व का गर्व होना चाहिए।
                                               

बाँध और मेधा पाटकर

--------एक और बेतुका विलाप-----------------

नेशनल बुक ट्रस्ट इंडिया की एक किताब से मेधा पाटकर पर लिखे पाठ को हटाये जाने को ले कर नई रुदाली फिल्म की शूटिंग शुरू हो गयी है. मृतप्राय वामपंथी, स्वयं को राजनैतिक एक्टिविस्ट कह कर, स्वयं को नए मुखौटे में छिपा कर हू-हू करके अपने फेफड़ों में हवा भर रहे हैं और जहरीला, काला धुआं उगल रहे हैं. उनके निकट ये सहिष्णुता और विचारों की स्वतंत्रता पर मुश्किल खड़ी किया जाना है. घटना ये है कि अहमदाबाद के एक वरिष्ठ समाजसेवी श्री वी. के. सक्सेना ने उनके इस पुस्तक में होने पर विरोध व्यक्त किया और मेधा जी वाले पाठ को हटाया गया. ज्ञातव्य है कि श्री सक्सेना सरदार सरोवर के प्रबल समर्थक हैं और विकास की मूलभूत आवश्यकताओं को समझते हैं.

उल्लेखित पुस्तक भारत के उन चर्चित व्यक्तित्वों के बारे में है, जिनके जीवन से बच्चे प्रेरणा ले सकें. इस पल आवश्यक होगा कि मेधा पाटकर के बारे में जाना जाये और समझा जाये कि वो किस कारण से नेशनल बुक ट्रस्ट इंडिया की एक किताब में आने की पात्रता रखती थीं. मेधा पाटकर नर्मदा नदी पर बने सरदार सरोवर बांध के विरोध में आंदोलन को ले कर चर्चा में आयीं हैं. नर्मदा भारत की बड़ी नदियों में से एक है और मध्य प्रदेश तथा गुजरात से हो कर अरब सागर तक जाती है. इस नदी के पानी के बटवारे को ले कर दोनों प्रदेशों में विवाद चलता आ रहा था तो केंद्र सरकार ने इस विवाद को सुलझाने के लिए छह अक्टूबर 1969 को एक ट्रिब्यूनल बना दिया. बारह दिसंबर 1979 को ट्रिब्यूनल ने नर्मदा पर तीस बड़े बांध, एक सौ पैंतीस मझोले बांध और चार हज़ार छोटे बांधों को बनाये जाने की संस्तुति की.

आगे बात बढ़ाने से पहले आवश्यक है कि नदियों और बांधों के बारे में विचार किया जाये. नदियां क्या हैं ? पानी का स्वभाव है कि वो नीचा तल ढूंढता है. ऊंचाई के क्षेत्र के पानी को नीचे के क्षेत्र तक जाने का नदियां मार्ग हैं. नदियां किसी भी देश की भौगोलिक संरचना का प्रमुख हिस्सा हैं. चूँकि उनका पानी जीवन के लिए अनिवार्य है अतः वो राष्ट्र की बड़ी संपत्ति हैं. यानी पर्वतों से उतरता उनका पानी समुद्र में फेंकने के लिए नहीं है. मनुष्यता के विकास के साथ मानव ने इस बह कर नष्ट हो जाने वाले पानी के उपयोग के सृष्टि के उषा काल से ही तरीके ढूंढे हैं. सबसे प्राचीन सभ्यताओं में बाँध बनाने के उल्लेख हैं.

बांध इस बह कर नष्ट हो जाने वाले पानी का मानव जीवन के हित में प्रयोग करने का कौशल है. प्रकृति के विनाशी स्वभाव पर लगाम लगाने का मनुष्य की मेधा का उपक्रम है. कभी पटना जा कर गंगा या पुनपुन नदी का फैलाव देखिये. एक बार आप पुल पर चढ़ेंगे तो दसों मील निकल जाने पर भी पाट का दूसरा छोर नहीं दिखाई देता. ये नदी द्वारा समुद्र तक जाने के मार्ग में वर्षा काल में अनियंत्रित हो कर बाढ़ से धरती को बंजर बना दिए जाने का सामान्य उदाहरण है.

ये दृश्य किसी भी नदी के पुल पर जा कर देखा जा सकता है. मीलों तक दायें-बाएं वीरान बंजर धरती, कृषि योग्य भूमि के कटाव के दृश्य नदी को नाथने और बांधों के पक्ष में सोचने के लिए बाध्य करते हैं. मानव सभ्यता जल के प्रबंधन तथा अपशिष्ट पदार्थों और दूषित जल के निस्तारण से ही बनी और विकसित हुई है. जीवन के लिए पानी इतना आवश्यक है कि सरस्वती नदी का प्रवाह अवरुद्ध हो जाने पर वेदों में बड़े सम्मान से वर्णित सरस्वती नदी के तटों पर बसी विकसित सभ्यता समाप्त हो गयी. अकबर द्वारा बसाया शहर फतेहपुर सीकरी पानी की अनुपलब्धता के कारण अकबर के सामने ही वीरान हो गया.

बांध मूलतः पांच काम कर सकते हैं.
1 :- पेय जल की उपलब्धता
2 :- सिंचाई के लिए पानी
3 :- बांधों द्वारा विद्युत उत्पादन
4 :- पानी को सहेजने के कारण बाढ़ पर नियंत्रण
5 :- जल परिवहन

इसके अतिरिक्त परमाणविक रिएक्टरों के लिए भी अबाध पानी चाहिए होता है. यानी परमाणु ऊर्जा का उत्पादन भी तभी संभव है जब प्रचुर पानी उपलब्ध हो. आज उत्तराखंड में गंगा पर बने टिहरी बांध के कारण गुड़गांव, नॉएडा को पीने का पानी मिलता है. इसी बांध से निकली नहरों से उत्तर प्रदेश की सिंचाई होती है.
ऐसा ही बांध सरदार सरोवर है. बारह दिसंबर 1979 को ट्रिब्यूनल द्वारा स्वीकृति दिए जाने के बाद बांध बनाने का कार्य शुरू हुआ और 2006 से बांध बन कर तैयार हो गया. सरदार सरोवर बांध से बारह जनपदों, बासठ ताल्लुकों, तीन हजार तीन सौ तिरानवे गांवों में फैले अट्ठारह हजार किलोमीटर क्षेत्र की कृषि भूमि की सिंचाई होती है. मूलतः ये भूमि सदियों से सूखाग्रस्त क्षेत्र कच्छ और सौराष्ट्र की है.

इसके अतिरिक्त राजस्थान में सात सौ तीस किलोमीटर के बाड़मेर और जालौर जनपदों में सिंचाई हो रही है. इसके अलावा चौदह सौ पचास मेगा वाट विद्युत का उत्पादन हो रहा है. सुप्रीम कोर्ट द्वारा साल दो हजार में दिये गए निर्णय के अनुसार इस बांध के कारण दो करोड़ लोगों को घरेलू पेय जल तथा औद्योगिक जल उपलब्ध हो रहा है. सत्तर हजार उद्योगों को विद्युत मिल रही है. ग्रामीण क्षेत्रों में सिंचाई के लिए चौबीस घंटे विद्युत उपलब्ध है. गुजरात में चौबीस घंटे बिजली की उपलब्धता इसी बांध के कारण है. इसी के कारण वहां के उद्योग चल रहे हैं. मेधा पाटकर इस विकास को संभव बनाने वाले बांध के विरोध के कारण चर्चा में आयीं हैं.

चौबीस घंटों के टी. वी. चैनलों ने समाज में बहुत से कागज के शेर पनपा दिए हैं. मेधा पाटकर भी उन्हीं में से एक हैं. उनका आंदोलन कभी भी लोकप्रिय नहीं रहा. उनके साथ, जिन लोगों के हित के नाम पर वो अला-बला बोलती हैं, धरने, प्रदर्शन, अनशन करती हैं, ने कई बार उद्दंडता की है. उन्हें मारा-पीटा है. मेधा पाटकर सौराष्ट में भी नरेंद्र मोदी जी का विरोध करने गयीं. गुजरात की शांत और अहिंसक जनता ने उन्हें दो दिन, जी हाँ केवल दो दिन नहीं टिकने दिया. अगर नरेंद्र मोदी जी की पुलिस उनकी सुरक्षा नहीं करती और स्वयं मार खा कर मेधा पाटकर को बचा कर न निकालती तो सरदार सरोवर के लिए उनकी सरदार सरोवर के जल से सिंचित क्षेत्र में ही आहुति हो गयी होती.

चलिए कुछ पल के लिए मान लेते हैं कि गुजरात की जनता शायद उतनी शिक्षित नहीं थी सो उनकी बात पूरी तरह समझ नहीं पायी होगी. मेधा पाटकर ने आम आदमी पार्टी के टिकिट पर मुंबई से लोक सभा का चुनाव लड़ा. मुख्य मुकाबले में आना तो दूर वो भारतीय जनता पार्टी के विजयी उम्मीदवार किरीट सोमैया के हाथों जमानत भी जब्त करा बैठीं. इस तरह की हाय-हत्या योरोप, कनाडा में भी होती थी. बेलगाम प्रेस वहां भी अपनी टी. आर. पी. बढ़ाने के लिए इन मुद्दों को हवा देता था. रूस और चीन के इशारे और पैसे के बल पर बरसों ये बन्दर-नाच वहां भी तब तक होते रहे जब तक कि वहां की जनता ने भी तंग आ कर ऐसे उत्पातियों को सबक सिखाना शुरू नहीं किया. जनता ने इन ऐसे लोगों की शब्दशः ताड़ना की और फिर विकास का चक्र चल पाया.

इस विषय में बंद विरोधियों के एक प्रबल तर्क भी है. बाँध की एक बड़ी समस्या भी है. बांध का पानी जिस क्षेत्र में फैलेगा, जो उसके जल-संग्रहण का क्षेत्र होगा, वहां जाहिर है लोग रहते हैं. उस इलाके में उनके खेत हैं. उनके गांव हैं अतः डूब क्षेत्र के लोगों के पुनर्स्थापन का कार्य होना ही चाहिए. उनकी उपयुक्त व्यवस्था होनी ही चाहिए मगर क्या इसके लिए बांध रोक दिए जाएँ ?

भारत अविकसित रहे, निर्धन रहे, अपनी आवश्यकताओं के लिए संसार भर में गिड़गिड़ाता रहे, ये हर विकसित देश की हार्दिक अभिलाषा है. ये भारत के खिलाफ संसार भर के देशों का षड्यंत्र है. हम विश्व की सबसे पुरानी, सबसे प्रखर सभ्यता हैं. भारत यूँ ही सोने की चिड़िया नहीं कहलाता था. संसार भर का सोना भारत में खिंच कर आता था और उसका कारण संसार के उत्पादन और व्यापार पर हमारा वर्चस्व था. अपने विकास के चरम काल में विश्व के उत्पादन का सत्तर प्रतिशत हिस्सा हमारा था. वो स्थिति अगर हमने फिर प्राप्त कर ली तो हम पर कौन दबाव दे सकेगा ? हम किसकी धौंस सहेंगे ?

अपनी मनमर्ज़ी के उटपटांग निष्कर्ष निकल कर, समाज के विकास की धारा को अवरुद्ध करने के आरोप में जिन लोगों को दण्डित किया जाना चाहिए उनके जीवन के बारे में नेशनल बुक ट्रस्ट इंडिया की एक किताब लेख क्यों छापती है ? मेधा पाटकर जैसे लोग इतिहास के कूड़ेदान में फेंके जाने के पात्र हैं. वही कूड़ेदान जहाँ वो राष्ट्र को फेंकने के षड्यंत्र का हिस्सा बने हुए हैं. ये और इसी तरह के लोग देश के विकास के मार्ग में कांटे बोने का काम कर रहे हैं. नेशनल बुक ट्रस्ट इंडिया की एक किताब से निकलना ही नहीं इस तरह के षड्यंत्रकारियों को हर तरह से पराभूत करना, इनका हर तरह से दमन करना देश हित का काम है. यहाँ अपने ही एक पुराने शेर से बात ख़त्म करता हूँ

बना के बांध तुझे झील कर के छोड़ूंगा
ज़रा सा ठहर नदी तेरे बल निकालता हूँ

तुफैल चतुर्वेदी जी की पोस्ट

अहिंसा कायरों का शस्त्र है

---"16 अगस्त 1946 एक न भूलने वाला दिन"-----

वैश्विक राजनीति का बहुत प्रसिद्द वाक्य है। "इतिहास भूलने वाले उसे दुहराने के लिये अभिशप्त होते हैं"। आइये 16 अगस्त 1946 को मुस्लिम लीग के नेतृत्व में मुसलमानों द्वारा किये गये प्रदर्शनों को स्मरण किया जाये। मुस्लिम बहुल नगरों में भयानक ख़ूनख़राबे से भरी यह इस्लामी रैलियां कांग्रेस और हिन्दुओं पर दबाव बनाने के लिये की गयी थीं। जिनमें हज़ारों हिन्दुओं की हत्या की गयी थी, भयानक बलात्कार हुए थे, विध्वंसात्मक लूट की गयीं थीं। यहाँ यह जानना उपयुक्त है कि हिन्दुओं ने गाँधी के कायर नेतृत्व के बाद भी पूज्य गोपाल चंद्र मुखर्जी जिन्हें गोपाल पाठा भी कहा जाता के नेतृत्व में देर से सही मगर भरपूर उत्तर दिया था।

मुस्लिम लीग के सर्वमान्य नेता मुहम्मद अली जिनाह का वक्तव्य इसकी प्रेरणा था। "हमने सर्वाधिक महत्व का ऐतिहासिक निर्णय ले लिया है....... आज हमने संवैधानिक उपायों को तिलांजलि दे दी है।....... हमारी जेब में भी पिस्तौल है " संदर्भ फ़ाउंडेशन ऑफ़ पाकिस्तान लेखक पीरज़ादा पृष्ठ संख्या 559-560। जैसे जैसे 16 अगस्त निकट आता गया। मुस्लिम लीग ने सभी महानगरों और छोटे नगरों में हिन्दुओं के विरुद्ध जिहाद छेड़ दिया।

सिंध और पंजाब पुलिस में 70% मुसलमान थे। संयुक्त प्रान्त { तत्कालीन उत्तर प्रदेश } तथा बंगाल में वे 50% थे। मुस्लिम लीग का साँप चारों ओर आग उगल रहा था। जघन्य कोलकाता हत्याकाँड के लिये मुख्यमंत्री सुहरावर्दी और उसके दायें हाथ मुजीबुर्रहमान ने जो बाद में बांग्ला देश का राष्ट्रपति बना, ने कमान संभाल रखी थी। यह जानना उपयुक्त होगा कि जिस मुजीबुर्रहमान को 1971 में हम ने बचाया उसका रोल 1946 में किस क़दर नीच था। कोलकाता और आस-पास के मुस्लिम गुंडों को इकट्ठा किया गया। उन्हें हथियार और पैट्रोल बम बनाने के लिए उस काल में सरकार द्वारा नियंत्रित और राशन के पैट्रोल के कूपन दिए गए। हावड़ा में गुंडों की टोलियों का नेतृत्व ख़ुद कोलकाता के मेयर शरीफ़ ख़ाँ ने किया। 24 पुलिस मुख्यालयों में 22 हिन्दू अधिकारी बदल कर मुसलमान रखे गए। शेष 2 एंग्लो-इंडियन थे।

16 अगस्त की सुबह मुस्लिम लीग ने विशाल जुलूस निकाले। जिनके मिलन बिंदु पर मुख्यमंत्री सुहरावर्दी के नेतृत्व में विशाल सभा हुई। एक के बाद एक हर वक्त ने काफ़िर हिन्दुओं के विनाश के लिये भीड़ को उकसाया। सभा के बाद लौटती हुई भीड़ ने बड़े पैमाने पर हिन्दुओं की हत्या की। हिन्दुओं पर भयानक लूटपाट, आगज़नी, बलात्कार किये गये। इस्लामी काल के भीषण अत्याचारों को बड़े पैमाने पर फिर दुहराया गया। 2 दिन तक यह पिशाच लीला चलती रही। कोई रोकने टोकने वाला न था। किसी मुस्लिम दंगाई को गिरफ़्तार भी कर लिया जाता था तो तुरंत पुलिस मुख्यालय में बैठा मुख्यमंत्री सुहरावर्दी उसे छुड़वा देता था। अँग्रेज़ गवर्नर ऐफ़ बरोज़ गूंगा, बहरा, अँधा बना बैठा था।

कोलकाता की सड़कों पर कुछ ही घंटों में 10 हज़ार हिन्दुओं के शव पड़े हुए थे। बुरी तरह के कटे-पिटे हिन्दुओं की संख्या 15 हज़ार से अधिक थी। 1 लाख से अधिक लोग बेघरबार हो गए। उनका सर्वस्व नष्ट कर दिया गया था। चारों तरफ़ हाहाकार मचा हुआ था। मुस्लिम लीग का नेतृत्व तो इस जिहाद का संचालन ही कर रहा था मगर कांग्रेस का नेतृत्व भी गूंगा, बहरा, अँधा बन गया था। मोहन दास गाँधी का मुंह ही नहीं सिला हुआ था बल्कि साथ ही सारे के सारे कोंग्रेसी नेता मौन थे। हिन्दू वर्षों से जिनको अपना नेता मानते थे उन्होंने भयानक संकट, दारुण पीड़ा की इस घडी में हिन्दुओं से मुंह फेर लिया था।

स्टेट्समैन के संवाददाता किम क्रिस्टेन ने लिखा है "युद्ध के अनुभव ने मुझे कठोर बना दिया है किन्तु युद्ध की विभीषिका भी ऐसी भयावनी नहीं होती। यह दंगा नहीं है। इसके लिए तो शब्द मध्य युग { अर्थात इस्लामी जिहाद } के इतिहास में खोजना होगा। " संदर्भ गाँधी हिज़ लाइफ़ एंड थॉट पृष्ठ संख्या 253 लेखक जे बी कृपलानी

अंततः हिन्दुओं ने समझ लिया कि अपना बचाव उन्हीं को करना होगा। वो प्रत्युत्तर देने में जुट गये और पाँसा पलट गया। हिन्दू पौरुष का सूर्य उदय होते ही मुस्लिम आतंक का अंधकार छँट गया। बंगाल, बिहार, संयुक्त प्रान्त में आततायी मुसलमानों को उसी दवा का भरपूर स्वाद मिलने लगा जिसकी खोज उन्होंने ही की थी।

आपमें से जिसने भी बेन किंग्सले वाली गाँधी पिक्चर देखी हो, वो कोलकाता के दंगों के समय गाँधी के आमरण अनशन के करुणापूर्ण दृश्य स्मरण कर पायेंगे। यह दृश्य कोलकाता की दो दिन तक रात-दिन चली इस्लामी हिंसा के हिन्दू प्रत्युत्तर के बाद का है। दो दिन से हिन्दुओं के नरसंहार पर मौन गाँधी हिन्दुओं के पराक्रम से विगलित हो उठे। गाँधी ने थरथर काँपते सुहरावर्दी को अपनी ओट में छिपा लिया। हिन्दुओं के प्रतिशोध से इस्लामी अत्याचारियों को बचाने के लिये गाँधी आमरण अनशन पर बैठ गये।

पूज्य गोपाल चंद्र मुखर्जी जिन्हें गोपाल पाठा भी कहा जाता के नेतृत्व में हिन्दू अपने चक्रवर्ती पूर्वजों को गौरवान्वित करने पर तुल गए। क्षत्रियत्व जाग उठा।  बंगाल के साथ बिहार भी धूधू कर जल उठा। इस्लामी गुंडों पर पड़ती मार से उन्हें बचने के लिए कांग्रेस के नेतृत्व ने उन पर हवाई जहाज़ और हैलीकॉप्टरों से गोलियां चलवायीं। यह वह समय था जब कांग्रेस को हिंदुओं के पौरुष को इस्लामी उद्दंडता के सामने डाटने का आह्वान करना चाहिए था मगर कांग्रेस हिंदु-पौरुष को शांत करने में जुट गयी और गाँधी ने हिन्दुओं के ख़िलाफ़ आमरण अनशन का तुरुप का पत्ता चल दिया। भोले-भाले शांतिप्रिय, धर्मभीरु हिन्दू गाँधी और कांग्रेस के दबाव में आ गये।

यह वह समय था जब हिन्दुओं को अपने पराक्रमी पूर्वजों के मार्ग पर चलना चाहिए था। यदि ऐसा होता तो पूज्य मातृभूमि का विभाजन न हुआ होता और इस्लामी समस्या का अंततोगत्वा उपयुक्त समाधान हो गया होता। राष्ट्रबन्धुओ ! पौरुष का कोई विकल्प नहीं होता। अपौरुष होना और स्त्रैण होने में कोई अंतर नहीं होता। आज के दिन को कभी मत भूलियेगा। यह दिन आँखों से आंसुओं के नहीं आग्नेय ज्वाला उठाने का है।

तुफ़ैल चतुर्वेदी जी की पोस्ट

जब नेहरू की वजह से मारे गए हजारों कश्मीरी

1947 में हुए भारत - पाकिस्तान विभाजन की कई दर्दनाक किस्से हैं जिन्हें हम सभी नहीं जानते हैं!
ऐसा ही एक दर्दनाक किस्सा है तत्कालीन कश्मीर रिसायसत के एक शहर मीरपुर का जिससे मैं आप सभी को अवगत करा रहा हूँ!

पर मीरपुर की कहानी इस मायने में ज्यादा दर्दनाक है क्योंकि यहाँ के हिन्दू वाशिंदों की खुद को पाकिस्तानी सेना से बचाने की गुहार को भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और तत्कालीन कश्मीर रियासत के प्रमुख शेख अब्दुल्ला ने अनसुना कर दिया और उन्हें पाकिस्तानी सेना के हाथो मरने को छोड़ दिया था!
परिणामतः पाकिस्तानी सेना ने मीरपुर पर आक्रमण कर के 18000 हिन्दुओं और सीखो की हत्या कर दी!
पाकिस्तानी फौज ने मीरपुर के करीब पांच हजार युवा लड़कियों और महिलाओं का अपहरण कर लिया था और उन्हें अपने साथ पाकिस्तान ले गई!
उन लड़कियों और महिलाओं को बाद में मंडी लगाकर पाकिस्तान और खाड़ी के देशों में बेच दिया गया था!

आइए घटनाक्रम को विस्तार पूर्वक जानते है!

1947 में भारत - पाकिस्तान के बटवारे के समय मीरपुर के सभी मुसलमान 15 अगस्त के आस पास बिना किसी नुकसान के पाकिस्तान चले गए थे!
भारत के विभाजन के समय पाकिस्तान के पंजाब से हजारों हिंदू और सिख मीरपुर में आ गए थे!
इस कारण उस समय मीरपुर में हिंदुओं की संख्या करीब 40 हजार हो गई थी! मीरपुर जम्मू - कश्मीर रियासत का एक हिन्दू बहुल शहर था!
मुसलमानों के खाली मकानों के अलावा वहाँ का एक बहुत बड़ा गुरुद्वारा दमदमा साहिब, आर्य समाज, सनातन धर्म सभा और बाकी सभी हिन्दू मंदिर हिन्दू और सिख शरणार्थियों से भर गए थे! यही हालत कोटली, पुंछ और मुजफ्फराबाद में भी हुई थी!

मीरपुर और आसपास के इलाकों के रियासत को भारत में विलय की घोषणा 27 अक्टूबर से पहले ही अगस्त में पाकिस्तान में शामिल किए जा चुका था!
यह क्षेत्र कश्मीर के महाराजा की सेना की एक टुकड़ी के सहारे था! पाकिस्तानी इलाकों से भागे हुए हिन्दू और सिख यहाँ आ रहे थे! नेहरू सरकार ने यहाँ अपना कब्जा मजबूत करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया और न ही कश्मीर की तत्कालीन सरकार ने हिन्दुओं की रक्षा के लिए सेना की टुकड़ी ही मीरपुर  भेजी!

इधर 16 नवंबर तक बड़ी संख्या में भारतीय सेना कश्मीर आ चुकी थी! 13 नवंबर को शेख अब्दुल्ला दिल्ली पहूँच गया! 14 नवंबर को नेहरू ने मंत्रिमंडल की जल्दी में बैठक बुलवाई और सेना मुख्यालय को सेना झंगड़ से आगे बढ़ने से रोकने के आदेश दिए! मीरपुर की ओर पीर पंचाल की ऊँची पहाड़ी है! यहाँ तक भारतीय सेनाओं का नियंत्रण हो चुका था! परंतु आदेश न मिलने के कारण सेना और आगे नहीं बढ़ी!

मीरपुर के हालात लगातार बिगड़ते जा रहे थे! मेहरचंद महाजन ने शेख अब्दुल्ला को बताया कि मीरपुर में 25 हजार से ज्यादा हिंदू-सिख फंसे हुए हैं! उन्हें सुरक्षित लाने के लिए कुछ किया जाना चाहिए! जम्मू - कश्मीर की जो आठ सौ सैनिकों की चौकी थी, जिसमें आधे से अधिक मुसलमान थे, वे अपने हथियारों समेत पाकिस्तान की सेना से जा मिल थे! मीरपुर के लिए तीन महीने तक कोई सैनिक सहायता नहीं पहुँची शहर में 17 मोर्चों पर बाहर से आए हमलावरों को महाराजा की सेना की छोटी सी टुकड़ी ने रोका हुआ था! सैनिक मरते जा रहे थे!
16 नवंबर को पाकिस्तान को पता चला कि भारतीय सेनाएं जम्मू से मीरपुर की ओर चली थीं, उनको उड़ी जाने के आदेश दिए गए हैं!

मीरपुर में शेख अब्दुल्ला ने सेना नहीं भेजी! मीरपुर की हालत का जानकार जम्मू का एक प्रतिनिधि मंडल 13 नवंबर को दिल्ली गया! नेहरूजी ने पूरे प्रतिनिधि मंडल को कमरे से बाहर निकलवा दिया और अकेले मेहरचंद महाजन से बात की!
नेहरू ने मेहरचंद को शेख अब्दुल्ला से बात करने कहा इसके बाद मेहरचंद सरदार वल्लभ भाई पटेल के पास गए! सरदार ने कहा कि वह बेबस हैं! इस बात पर पंडित जी से बात बिगड़ चुकी है! पटेल ने कहा कि पंडित नेहरू कल (15 नवम्बर, 1947) जम्मू जा रहे हैं! आप वहाँ उनसे मिले सकते हैं!

15 नवंबर को जब पंडित नेहरू जम्मू पहुंचे तो हजारों लोग उनका इंतजार कर रहे थे! पर नेहरूजी बिना किसी से बात किए चला गया! इधर, दिल्ली में ये लोग गांधी से मिले तो उसने जवाब दिया कि मीरपुर तो बर्फ से ढ़का हुआ है! उसको यह भी नहीं पता था कि मीरपुर में तो बर्फ ही नहीं पड़ती!

25 नवबंर को हवाई उड़ान से वापस आए एक पायलट ने बताया कि मीरपुर के लोग काफिले में झंगड़ की ओर चल पड़े हैं!
शहर से आग की लपटें उठ रही हैं!
इसके बाद जो हुआ, वह बहुत ही दर्दनाक है! रास्ते में पाकिस्तान की फौज ने उन्हें घेर कर उनका कत्लेआम कर दिया! किसी परिवार का एक व्यक्ति मारा गया था, किसी के दो व्यक्ति!
कई ऐसे थे जिनकी आँखों के सामने उनके भाइयों, माता - पिता और बच्चो को मार दिया गया था!
कई ऐसे थे जो रो - रो कर बता रहे थे कि कैसे वे लोग उनकी बहन - बेटियों को उठाकर ले गए!
25 नवंबर को भारतीय सेनाओं को पता चल गया था कि मीरपुर से हजारों की संख्या में काफिला चल चुका है और पाकिस्तानी सेना ने शहर लूटना शुरू कर दिया है!

मीरपुर में उत्तर की ओर गुरुद्वारा दमदमा साहिब और सनातन धर्म मंदिर थे!
इनके बीच में एक बहुत बड़ा सरोवर और गहरा कुआं था! लगभग 75 प्रतिशत लोग कचहरी से आगे निकल चुके थे!
स्त्रियों, लड़कियों और बूढ़ों को पाकिस्तानी कबाइलियों (सैनिकों) ने घेर लिया था!

मीरपुर के आर्य समाज के स्कूल के छात्रावास में 100 छात्राएं थीं! छात्रावास की अधीक्षिका ने लड़कियों से कहा अपने दुपट्टे की पगड़ी सर पर बांधकर और भगवान का नाम लेकर कुओं में छलांग लगा दें और मरने से पहले भगवान से प्रार्थना करें कि अगले जन्म में वे महिला नहीं, बल्कि पुरुष बनें! बाद में उन्होंने खुद भी छलांग लगा दिया! कुंआ इतना गहरा था कि पानी भी दिखाई नहीं देता था! ऐसे ही सैकड़ों महिलाओं ने अपनी लाज बचाई! बहुत से लोग अपनी हवेली के तहखानों में परिवार सहित जा छुपे, लेकिन वहशियों ने उन्हें ढूंढ निकाला तथा मर्दों और बूढ़ों को मार दिया!

उस दौरान पाकिस्तानी सेना सारी हदें पार कर चुकी थी।! 25 नवंबर के आसपास पांच हजार हिंदू लड़कियों को वे लोग पकड़ कर ले गए! बाद में इनमें से कई को पाकिस्तान, अफगानिस्तान और अरब देशों में बेचा गया! कबाइलियों ने बाकी लोगों का पीछा करने के बजाय नौजवान लड़कियों को पकड़ लिया और शहर को लूटना शुरू कर दिया! इसी दौरान वहाँ से भागे हुए मुसलमान मीरपुर वापस आ गए और शाम तक शहर को लूटते रहे! उन सबको पता था कि किस घर में कितना माल और सोना है!

मीरपुर को लूटने में लगे पाकिस्तानी सैनिकों ने मीरपुर से करीब दो घंटे पहले निकल चुके हिन्दू काफिले का पीछा नहीं किया था! हिन्दुओं का काफिला अगली पहाड़ियों पर पहुँच गया! वहाँ तीन रास्ते निकलते थे!
तीनों रास्तों पर काफिला बंट गया! जिसको जहाँ रास्ता मिला, भागता रहा!

पहला काफिला सीधे रास्ते की तरफ चल दिया जो झंगड़ की तरफ जाता था!
दूसरा कस गुमा की ओर चल दिया!
पहला काफिला दूसरी पहाड़ी तक पहुँच चुका था,
परंतु उसके पीछे वाले काफिले को कबाइलियों ने घेर लिया!
उन दरिंदों ने जवान लड़कियों को एक तरफ कर दिया और बाकी सबको मारना शुरू कर दिया! कबाइली और पाकिस्तानी उस पहाड़ी पर जितने आदमी थे, उन सबको मारकर नीचे वाले काफिले की ओर बढ़ गए! इस घटनाक्रम में 18,000 से ज्यादा लोग मारे गए!

वर्तमान में मीरपुर पाकिस्तान में है लेकिन वहाँ पुराने मीरपुर का नामोनिशान बाकी नहीं है! पुराने मीरपुर को पाकिस्तान ने झेलम नदी पर मंगला बाँध बना कर डुबो दिया है!