राहुल गांधी एक अनिच्छुक नेता और कृत-संकल्पित मसखरे हैं | मेरे लिए जिज्ञासा केवल इतनी है कि वे दूसरी बात को किस डिग्री तक समझ पाए हैं, क्योंकि मैं इतना तो जानता हूँ कि वे जानते हैं कि वे क्या हैं और इसीलिए जब हाल ही में उनकी जीजी और जीजाजी ने अपने पुत्र के नाम में 'राजीव' एड किया तो इसमें सहमति और परामर्श राहुल गांधी का भी रहा होगा |
और इसीलिए वे कांग्रेस के दुर्दिनों को, सत्ता पक्ष और सोशल मीडिया के हमलों को किसी जहर की भांति गटक रहे हैं, क्योंकि वे जानते हैं एक न एक दिन, बेशक चार टर्म के बाद ही सही जब कांग्रेस का नम्बर आएगा तब तक वे अपने विरोधियों द्वारा उलीचा गया सारा जहर पी जायेंगे और सत्ता की चाबी अपने भांजे के हाथ में सौंप सकेंगे |
अन्यथा मुझे कोई अन्य कारण नजर नहीं आता कि आखिर क्या वजह है वे भारत की राजनीति और वर्तमान समय में मुद्दों की समझ से जूझ रहे हैं | मेरे देखते-देखते लालू जी के दोनों पुत्र भी सक्सेसफुली लॉन्च हो गए, जिसमें दूसरे वाले; पता नहीं वे बड़े हैं या छोटे - तेजप्रताप तो अदभुत हैं | कल पटना की रैली में उन्होंने बिना रुके तीन बार शंख फूंका |
जिन लोगों का शंख से कभी वास्ता नहीं पड़ा है उनको मैं बता दूं कि एक बार शंख बजाने में लगातार आधा घंटा दौड़ने के बराबर एनर्जी लगती हैं लेकिन उन्होंने तीन बार शंख फूंककर साबित कर दिया कि उनके भीतर स्टेमिना का लेवल क्या है ? बहरहाल सेट तो मुलायम सिंह जी के सुपुत्र अखिलेश जी भी हो गए हैं | अच्छा बोल लेते हैं, अब तो उनका चाचाओं से भी पिंड छूट गया है तो खूब खुश भी रहते हैं |
लेकिन राहुल जी क्या कर रहे हैं ? वे वही कर रहे हैं जो राजा-रजवाड़ों के समय महलों के भीतर रहने वाली रानियाँ करती थीं - गहने बनवाना और गहने तुड़वाना | अर्थात वे कागज पर लिखते हैं, कागज़ फाड़ते हैं जबकि मेरा आज भी मानना है कि अगर वे डॉ. साहब की दस साला सरकार के दौरान कोई भी गया गुजरा मंत्रालय लेकर, किसी पीआर एजेंसी के सहयोग से योजनाओं के पत्थर रखने और फीता काटने वाले काम भी कर डालते तो कांग्रेस और उन्हें इतने बुरे दिन न देखने पड़ते |
लेकिन जैसा कि मैंने कहा कि वे एक अनिच्छुक नेता हैं इसलिए नेतागीरी से परहेज करते हैं लेकिन उनके अंकिल लोग मानते नहीं हैं, उन्हें रोड शो, रैलियों और सभाओं में भेज देते हैं, द्विवेदी अंकिल उनके भाषण लिख देते हैं और कनिष्क भैया उन्हें अल-जजीरा चैनल से फीड बैक दे देते हैं तो उन्हें पता ही नहीं चलता है कि वे जहाँ गए थे वहां क्या 'कारनामा' करके आये हैं |
उनके मुखपत्र 'ऑफिस ऑफ़ आरजी' के अनुसार वे इन दिनों नॉर्वे राष्ट्र की आधिकारिक यात्रा पर हैं | वहां के विदेश मंत्रालय ने उन्हें पीली चिट्ठी भेजकर बुलाया है | नॉर्वे देश तो मासूम है ही, जैसा कि मैं मेरे आदरणीय मित्र 'प्रवीण जी' के माध्यम से अवगत होता रहता हूँ लेकिन अब तो मैं वहां की सरकार की मासूमियत का कायल हो गया हूँ | मतलब नॉर्वे सरकार ने लगता है बुद्धत्व प्राप्त कर लिए है जहाँ उनके लिए 'नरेन्द्र' या 'राहुल' सिर्फ ह्यूमन बीइंग हैं | वे उसके लिए नफा और नुकसान नहीं हैं |
बहरहाल मैंने प्रवीण जी से भी कहा है कि उन्हें नॉर्वे में जैसे ही राहुल जी की सभाओं, संबोधनों, रोड शोज या किसी भी प्रकार की ज्ञात-अज्ञात गतिविधि की जानकारी प्राप्त हो मुझे कृपया तुरंत सूचित करें, भारत वर्ष में, मैं उनका 'शुभचिंतक' बेसब्री से उनकी खबरों का इन्तजार कर रहा हूँ |
और इसीलिए वे कांग्रेस के दुर्दिनों को, सत्ता पक्ष और सोशल मीडिया के हमलों को किसी जहर की भांति गटक रहे हैं, क्योंकि वे जानते हैं एक न एक दिन, बेशक चार टर्म के बाद ही सही जब कांग्रेस का नम्बर आएगा तब तक वे अपने विरोधियों द्वारा उलीचा गया सारा जहर पी जायेंगे और सत्ता की चाबी अपने भांजे के हाथ में सौंप सकेंगे |
अन्यथा मुझे कोई अन्य कारण नजर नहीं आता कि आखिर क्या वजह है वे भारत की राजनीति और वर्तमान समय में मुद्दों की समझ से जूझ रहे हैं | मेरे देखते-देखते लालू जी के दोनों पुत्र भी सक्सेसफुली लॉन्च हो गए, जिसमें दूसरे वाले; पता नहीं वे बड़े हैं या छोटे - तेजप्रताप तो अदभुत हैं | कल पटना की रैली में उन्होंने बिना रुके तीन बार शंख फूंका |
जिन लोगों का शंख से कभी वास्ता नहीं पड़ा है उनको मैं बता दूं कि एक बार शंख बजाने में लगातार आधा घंटा दौड़ने के बराबर एनर्जी लगती हैं लेकिन उन्होंने तीन बार शंख फूंककर साबित कर दिया कि उनके भीतर स्टेमिना का लेवल क्या है ? बहरहाल सेट तो मुलायम सिंह जी के सुपुत्र अखिलेश जी भी हो गए हैं | अच्छा बोल लेते हैं, अब तो उनका चाचाओं से भी पिंड छूट गया है तो खूब खुश भी रहते हैं |
लेकिन राहुल जी क्या कर रहे हैं ? वे वही कर रहे हैं जो राजा-रजवाड़ों के समय महलों के भीतर रहने वाली रानियाँ करती थीं - गहने बनवाना और गहने तुड़वाना | अर्थात वे कागज पर लिखते हैं, कागज़ फाड़ते हैं जबकि मेरा आज भी मानना है कि अगर वे डॉ. साहब की दस साला सरकार के दौरान कोई भी गया गुजरा मंत्रालय लेकर, किसी पीआर एजेंसी के सहयोग से योजनाओं के पत्थर रखने और फीता काटने वाले काम भी कर डालते तो कांग्रेस और उन्हें इतने बुरे दिन न देखने पड़ते |
लेकिन जैसा कि मैंने कहा कि वे एक अनिच्छुक नेता हैं इसलिए नेतागीरी से परहेज करते हैं लेकिन उनके अंकिल लोग मानते नहीं हैं, उन्हें रोड शो, रैलियों और सभाओं में भेज देते हैं, द्विवेदी अंकिल उनके भाषण लिख देते हैं और कनिष्क भैया उन्हें अल-जजीरा चैनल से फीड बैक दे देते हैं तो उन्हें पता ही नहीं चलता है कि वे जहाँ गए थे वहां क्या 'कारनामा' करके आये हैं |
उनके मुखपत्र 'ऑफिस ऑफ़ आरजी' के अनुसार वे इन दिनों नॉर्वे राष्ट्र की आधिकारिक यात्रा पर हैं | वहां के विदेश मंत्रालय ने उन्हें पीली चिट्ठी भेजकर बुलाया है | नॉर्वे देश तो मासूम है ही, जैसा कि मैं मेरे आदरणीय मित्र 'प्रवीण जी' के माध्यम से अवगत होता रहता हूँ लेकिन अब तो मैं वहां की सरकार की मासूमियत का कायल हो गया हूँ | मतलब नॉर्वे सरकार ने लगता है बुद्धत्व प्राप्त कर लिए है जहाँ उनके लिए 'नरेन्द्र' या 'राहुल' सिर्फ ह्यूमन बीइंग हैं | वे उसके लिए नफा और नुकसान नहीं हैं |
बहरहाल मैंने प्रवीण जी से भी कहा है कि उन्हें नॉर्वे में जैसे ही राहुल जी की सभाओं, संबोधनों, रोड शोज या किसी भी प्रकार की ज्ञात-अज्ञात गतिविधि की जानकारी प्राप्त हो मुझे कृपया तुरंत सूचित करें, भारत वर्ष में, मैं उनका 'शुभचिंतक' बेसब्री से उनकी खबरों का इन्तजार कर रहा हूँ |